Friday, 20 October 2017

अमिताभ चक्रवर्ती // बांग्लादेशीय कविताएँ

नारायण सिंह, धनबाद- 20 अक्टूबर, 2017.
किताबों के बीच कैश-कैबिन : अमिताभ चक्रवर्ती
अमिताभ से मेरी पहली भेंट पंजाब नेशनल बैंक की धनबाद शाखा (बैंक मोड़) में हुई थी. वे वहाँ के कर्मचारी थे. वह भेंट ‘पहल’ लेने के सिलसिले में हुई थी. उनके पास इस पत्रिका की दस प्रतियाँ आया करती थीं. वहाँ वे कैश-कैबिन में बैठे खिड़की से ग्राहकों के साथ पैसे का लेन-देन कर रहे थे. मुझे किसी से कहकर उन्होंने कैबिन के बाहर बैठवाया और खुद अपना काम करने लगे. मैंने गौर किया आस-पास किताबों से भरी दो-तीन आलमारियाँ थीं. जैसे कोई छोटा-मोटा पुस्तकालय हो. कैश-कैबिन के आजू-बाजू किताबों से भरी आलमारियाँ देखकर अच्छा लगा. और अजीब भी. अजीब इसलिए कि इससे पहले किसी बैंक में कम से कम मैंने ऐसा दृश्य नही देखा था. लगा जैसे लक्ष्मी के सेतु पर से गुजरकर सरस्वती-गेह में प्रवेश हो रहा हो.
धनबाद में अमिताभ चक्रवर्ती को सेतु का पर्याय माना जाता था. शहर के दो साहित्यकारों के बीच बंद हो चुके संवाद को फिर से शुरू करने की बात हो या फिर बांग्ला से हिंदी और हिंदी से बांग्ला साहित्य के बीच आवा-जाही का मामला हो, अमिताभ एक पुल की भूमिका में दिखाई देते थे. बाद में उन्होंने ‘साहित्य सेतु’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन भी इसी उद्देश्य से आरंभ किया, किंतु उसके सिर्फ दो अविस्मरणीय अंक निकालने के बाद ही वे असामयिक मृत्यु के शिकार हो गए.
अमिताभ एक ऐसे विचारक, संवेदनशील कवि और एक कुशल अनुवादक थे, जिनके लिए रचना के लिए रचना या कला के लिए कला जैसा कुछ अभीष्ट नहीं था. इसीलिए ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ में जब बांग्लादेश की कविताओं के विशेष अंक की योजना बनाई तो उन्हें अमिताभ चक्रवर्ती से बेहतर कोई दूसरा दिखाई नहीं दिया. यह एक कठिन कार्य था. इसके लिए उन्होंने अथक श्रम किया,  अनेक यात्राएँ कीं. बांग्लादेशी कविताओं पर केंद्रित ‘पहल – 39’ का वह अंक हिंदी साहित्य की धरोहर और कठिन समय में प्रेरणा-स्रोत के रूप में याद किया जाता रहेगा. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है चयनित कविताओं की प्रकृति एवं प्रवृत्ति, जो आरंभ में ही इस मुहावरे में परिलक्षित होती है- ‘खामोशी का अर्थ पराजय नहीं होता / बांग्लादेश की एक सौ तीन जनमुखी कविताएं.
उस अंक के बीस पृष्ठों के अपने संपादकीय आलेख-  ‘बांग्लादेश की कविता का पूर्वपाठ’ में वे बांग्लादेश के राजनीतिक, भौगोलिक एवं साहित्यिक इतिहास का परिचय देते हुए पूर्व व पश्चिम बंग के बीच के तमाम हालात के अंतर को स्पष्ट करते हुए शमसुर रहमान को उद्धृत करते हैं, “दोस्तो! आप जो कवि हैं / स्वतंत्र देश के कवि / आपके उस भाग्य पर / ईर्ष्या हो रही है आज.”
और फिर दाउद हैदर के शब्दों में, “जी चाहता है / शहीद मीनार के शिखर पर चढ़कर / आकाश को चीरते हुए चीत्कार करूँ / देखो, सीमाके उस पार मेरा घर है / यहाँ मैं अकेला हूँ, परदेसी.”
अमिताभ चक्रवर्ती मार्क्सवादी तो थे, पर उनमें किसी प्रकार का छद्म नहीं था. कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जारी होने के डेढ़ सौ साल पूरे होने के अवसर पर ‘पहल’ द्वारा इस विषय पर जारी अमिताभ की पुस्तिका से हमें ज्ञात होता है कि समाजवाद के प्रति उनकी कैसी निष्ठा थी और इस आंदोलन की भारत में असफलता को लेकर उनके भीतर कितनी गहरी पीड़ा थी. ‘पहल’ के बांग्लादेशीय कविता-अंक की उपर्युक्त भूमिका के अंतिम परिच्छेद में वे लिखते हैं, “अवसरवादी बुर्जुआ नेतृत्व के हाथों में साम्यवादी आंदोलन की ऐसी-तैसी हो गई है. आज की सामाजिक समस्याओं की वैज्ञानिक व्याख्या और उनके निदान के लिए संगठित लोकतांत्रिक पहल इन समझौतावादी लोगों के वश की बात नहीं है. संपूर्ण विश्व में साम्यवाद के सामने जो संकट गहराया है और विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियों ने एकजुट होकर उसके लिए जो विरोधी वातावरण तैयार किया है, उसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों के समाजवादी आंदोलनों को जबरदस्त धक्का  लगा है. इस चुनौती का सामना करने का मनोबल अवसरवादी नेतृत्व में नहीं है. इसलिए साम्राज्यवादी शक्तियों और उनके दलालों के साथ ये लगातार समझौता कर रहे हैं और समाजवादी लक्ष्य से पीछे हटते जा रहे हैं. मेहनतकश वर्ग के हितों के पक्ष में यह कदापि नहीं है.”
किसी मनुष्य के जीवनकी सार्थकता उसके लंबे होने में नहीं, बल्कि इस अर्थ में है कि वह उसे जीता कैसे है. दिन, घंटे और मिनट के हिसाब से अमिताभ चक्रवर्ती का जीवन बहुत छोटा दिखाई दे सकता है. पर सार्थकता के लिहाज से उनका जीवन हम जीवितों से बहुत बड़ा है.
आने वाले दिनों में, आज के माहौल को देखते हुए, अमिताभ चक्रवर्ती द्वारा चयनित तथा अनूदित इन 103 बांग्लादेशीय कविताओं में से रफीक़ आज़ाद की ‘भात दे हरामजादे’ के अलावे कुछ अन्य कवियों की इसी मिज़ाज़ वाली कविताओं को सामने रखने का इरादा है.
नारायण सिंह, धनबाद.




Monday, 13 February 2017

मेरी कुछ प्रेम कविताएँ

कुछ कथाकारों के पास कविता लिखने की भी अद्भुत क्षमता है. दुर्भाग्य से मैं उन में नहीं. मुझे कविता लिखना बिलकुल नहीं आता. लेकिन मुझे यह भी पता है कि ऐसा शायद ही कोई गद्य-लेखक हो, जिसने अपने जीवन में कभी न कभी, अच्छी या बुरी कविताएं न लिखी हों. मैंने भी कई दशक पहले कुछ बुरी कविताएं की हैं, जिनमें से, दोस्तों की उदारता के कारण, कुछ को छपे हुए शब्द भी नसीब हो सके हैं. पर अपने कथा-साहित्य में, पाठकों और संपादकों के मन में इनके माध्यम से कहानी आगे बढ़ाने का भ्रम पैदा करते हुए, काट-पीटकर, कुछ ज्यादा बुरी कविताओं का उपयोग चालाकी से करता रहा हूँ. फेसबुक पर रोज़ सैकड़ों की संख्या में पोस्ट की जा रहीं कविताओं को देखकर मेरे अंदर भी (मेरी कहानियों में छपीं) कुछेक (प्रेम) कविताओं को स्वतंत्र रूप से सामने रखने का लोभ भयानक हो चला है. सो ‘प्रेम का अंत’ अर्थात ‘अंत में केवल प्रेम’ :--      

अंत में केवल प्रेम
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(1)
वक्त रुक गया
और देखता रहा
जैसे देखती है धरती
दिन और रात
गर्मी ठंडी बरसात
जैसे प्यासा देखता हो पानी
देखता हो मरता हुआ आदमी
छूटती हुई दुनिया
रुक गया वक्त आया स्पर्श
जैसे हवा छू लेती हो धरती
फूल नदी और समंदर
जैसे छूता हो किसान आद्रा में जुता हुआ खेत
छूता है बच्चा मां का स्तन और
कुम्हार चाक पर रखी मिट्टी
तेरा स्पर्श
ओ ज़िंदगी!
किसी की आंखों का इंद्रधनुष
आने की आहट
होठों का स्वाद
और... जैसे पानी पर लिखी कविता.
(2)
हम एक ऐसे मोड़ पर मिले थे जहाँ से
कोई राह
नहीं दिखाई देती थी आगे की ज़मीन
और पीछे....
वक्त कोई रिकार्डप्लेयर नहीं था
तुम्हारी पुतलियों में झिलमिला रहे थे ढेर सारे सितारे
उन में से कौन हूँ कहा हूँ जानने की कोशिश में
एक खूबसूरत झूठ से
ओझल हो गया था बदरंग अतीत
शोषण और भूख की ज़मीन से उपजा अवसाद
और संघर्षों के शंखनाद भी
आंखों के सामने पसरा था एक आभासी वर्तमान
प्रिय!
हमारा प्रेम क्या ऐसा नहीं लगा
जैसे भूख और बेकारी से भागकर शरण ली हो
किसी पराए देश में
बिना किसी पासपोर्ट और वीज़ा के!  
(3)
तमाम अनिश्चितताओं और झूठ और अविश्वास के बीच
एक शाम
जब सुनाई देने लगा था मृत्युराग
बजने लगे थे विदा के घरीघंट
रख दिया था आहिस्ते से
आशंका, ईर्ष्या और असुरक्षा के ताप से
झुलसते माथे पे अपना हाथ
अपने बच्चे सा लगा लिया था सीने से
सुनाई दे रही थीं साफ-साफ धड़कनें
तुम्हारे बिना होना क्या न होना भी क्या
तुम्हारे होने का एहसास
ये धड़कन ये सांस
और मैं केवल हवस और एषणा में
होता हुआ कृतघ्न
जितना पाया रख न सका
होता रहा बेचैन उसके लिए जो नहीं सुन सका
राग जीवन का.
(4)
एक जीवन में पता नहीं कितने जन्म
मृत्यु से पहले न जाने कितनी मृत्युएं
तुम्हारी हिदायतें कि रहो बस अपने में
मत देखो बाहर
कहाँ जाता है दूसरा क्या लेता है
देता है क्या...
नहीं रही शिकायत लेन-देन की
लिया है ज्यादा दिया है कम
और देखता हूँ गौर से
तो लिया ही लिया है
लोगों ने तो दे दिया है
फोएनिशिया साइप्रस और सिसिली जैसे पूरे इलाक़े
छोड़ दिया है तख्त और ताज़
आज भी तो देने वाले लोग
दे दिया करते हैं ग्रीस का
स्कॉर्पियो नाम का भव्य निजी द्वीप
सोना चांदी हीरा जवाहरात
इन सब के सामने कहाँ टिक सकता है
बस एक खाली सा प्रेम!

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Thursday, 1 September 2016

बेटी के घर में चौदह दिन


                            बेटी के घर चौदह दिन
      इस साल 15 अगस्त को बनारस में था. पहली बार इतना लंबा समय बेटी के यहाँ गुजरा. गुज़रा क्या, कपूर की भांति उड़ता रहा. ऊपर के एक कमरे में मेरा निर्बाध साम्राज्य और बगल के कमरे में साहित्यकार समधी जी के पुस्तकों से भरे रेक. जब चाहे किताबों पर के गर्द झाड़-झूड़कर लाइए और बड़े से बिस्तर पर फैला दीजिए. अनपढ़ी किताबों के बीच सोना-जागना. मन करे तो लैपटॉप में डाऊनलोड गज़ल और क्लासिकल गाने सुनना. या कुछ लिखना. दूसरा कोई भी काम नहीं. अनप्रोडक्टिव जीवन का ऐसा सुख बेचारे अंबानी और अडानी को कहाँ से कैसे मयस्सर हो सकता है!
        लेकिन खाने की बुलाहट पर नीचे तो जाना पड़ता था. इसके अलावा एक और ब्रेक होता था. तेरह वर्ष के शुभू जी दरवाज़ा खटखटाकर आदेशात्मक अनुग्रह करते - चलिए नाना, टी टी (टेबल टेनिस) खेला जाय.
इन दिनों उनके टी टी पार्टनर पिताश्री किसी सेमिनार में लेक्चर देने नोएडा और फिर लेह गए हुए थे. तो खेलने के लिए उन्हें एक पार्टनर की तलाश है. खेल भी मेरे जीवन का पढ़ने‌-लिखने के बराबर का हिस्सा रहा है. थोड़ा-थोड़ा वॉलीबॉल, फुटबॉल, बैडमिंटन और टी टी तथा बहुत सारा क्रिकेट. कई अन्य चीज़ें भी. पर वह अंगरेजी का मुहावरा है न - जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स बट मास्टर ऑफ नन, अपने पर बिलकुल फिट है.
कभी-कभी संशय होता है क्या शुभू जी अपने नाना के ही नक्शेकदम पर तो नहीं जा रहे हैं, जिसे मैं क्या कोई भी नहीं चाहेगा. वे भी क्रिकेट खेलना चाहते थे. नैसर्गिक तकनीक है, ऐसा देखकर जब भी धनबाद आते यहाँ के कोचिंग कैंप में डाल दिया करता. महीने भर में काफी प्रगति करते. पर होमवर्क में रुचि नहीं थी, और न कठिन श्रम करना चाहते, जिसके बिना किसी भी खेल में महारत हासिल नहीं किया जा सकता. अब आठवीं में पढ़ाई कठिन हो गई और क्रिकेट इस साल से छूट गया.
इन चौदह दिनों में हमने उनके साथ खूब टेबल टेनिस खेला. शुरू के दिनों में प्रैक्टिस में न होने से मुझे ज़ल्दी हार जाना पड़ता. एक कमरे में, चारों ओर से किताबों और कपड़ों की आलमारियों से घिरे छोटे आकार के टी टी टेबल पर खेलना,.. इस में मेरा डेब्यू हो रहा था. इसके बावज़ूद, इसे मेरी हार का बहाना नहीं बनाया जा सकता. मैं भी बाद में संभलने लगा. यह सही है कि अपने नाती से मिली हार पर कभी भी मलाल नहीं हुआ, पर हार तो हार ही है. अंतत:, अंतिम दिनों में मैं बराबर की टक्कर देने लगा. तो अब तय हुआ है कि दशहरे की छुट्टियों में, एक बार फिर से, पूना में अपने छोटे बेटे अनुराग के यहाँ, बड़े टी टी टेबल पर हम दोनों के बीच जोरआज़्माई होगी.
बेटी ने जब हम लोगों का पहला रिज़र्वेशन रद्द किया तो सवाल कर बैठा - बेटी के यहाँ इतने ज्यादा दिन?
उसने ज़वाब दिया – बेटों के यहाँ दो-दो महीने रहते हैं तब तो कुछ नहीं पूछते.
मैं चुप रहा. पत्नी की उंगली में चोट थी. उसे आराम मिल रहा था. वस्तुत: इसी वज़ह से बेटी ने बुलाया भी था. मेरा उपन्यास छपकर आने वाला था और बड़े के ब्रिसबेन में तथा छोटे के पूने में होने की वज़ह से हम कम दिनों के लिए कहीं अन्य जगह जा भी नहीं सकते थे. दामाद टूर से लौटे तो एक दिन उनके साथ बिग बाज़ार जाकर वह अपनी मां के लिए एक अटैची खरीद लाई. उसकी मां की अटैची इस हद तक पुरानी हो चुकी थी कि उसकी चेन बंद और खुलने में आनाकानी क्या खूंटा गाड़ दे रही थी. और आजकल करते-करते काफी दिन निकल गए थे. मैं उसे पैसे देने लगा तो उसने जवाब दिया – आपके बेटे आप लोगों को कुछ खरीदकर देते हैं तब तो आप उनसे कुछ नहीं कहते! मैं भी उनकी तरह कमा रही हूँ और अपना पैसा दे रही हूँ तो ऐसा प्रश्न क्यों? बेटा-बेटी में भेद-भाव करते हैं?
लेकिन मैं भी क्या करता! आखिर ठहरा एक गंवई आदमी ही न! बचपन में एक बार अपने बाबा के साथ अपनी बड़ी बहन की ससुराल बउरहंत (शादीके तुरत बाद लड़की की ससुराल भेजे जाने वाले कपड़े और मिठाई आदि) पर गया था. ट्रेन से जाने और लौटने में 25-30 घंटे लग जाने थे. बाबा अपने साथ गमछे में घर से सत्तू-रोटी बांधकर लेते गए थे. उन्होंने बहन के घर का कुछ भी नहीं खाया था.
चौदह दिनों बाद स्टेशन पर दामाद, बेटी और नाती से विदा लेने के बाद पत्नी कुछ ज्यादा ही भावुक दिखाई दे रही थीं. जब ट्रेन चली तो ऐसा लगा जैसे वे अपना मन बनारस ही छोड़ आई हों.     
          


Saturday, 26 July 2014

प्रभुता का पराभव अर्थात ईश्वरता का 'उपसंंहार'

प्रभुता का पराभव अर्थात ईश्वरता का ‘उपसंहार’
नारायण सिंह

मैथिली शरण गुप्त की दो पंक्तियाँ याद आती हैं,
‘‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है;
कवि कोई बन जाय सहज संभाव्य है।’’

बाल्मीकि के रामायण से लेकर अभी हाल में चर्चित और विवादित रामानुजन की प्रसिद्ध रचना ‘तीन सौ रामायण’ तक राम पर न जाने कितनी पोथियां रची गई हैं। किंतु कुछ लोगों का मानना है कि इनके बरअक्स कृष्ण पर केंद्रित रचनाएँ ज्यादा विविध और अपेक्षाकृत संख्या में ज्यादा हैं।
विद्वानों का एक वर्ग यह मानता है कि कृष्ण का व्यक्तित्व ज्यादा बहुआयामी, दुर्धर्ष, विनाशक होने के साथ-साथ नारी का पक्षधर और मानवीय रहा है। शायद इसी कारण पुरुषों  में जहाँ राम को ज्यादा लोकप्रियता मिली है, आधी आबादी के एक बड़े वर्ग में कृष्ण तुलनात्मक रूप से ज्यादा लोकप्रिय हैं। मथुरा-वृंदावन में आज भी मौजूद  हिन्दू परित्यक्ताओं और विधवाओं की एक बड़ी संख्या देखकर यह अंदाज लगाना कठिन नहीं कि विवश और बेसहारा स्त्रियों का अंतिम संबल पत्नी के संकटकाल में उसका परित्याग करने वाले राम नहीं, द्रौपदी की लाज बचाने और प्रागज्योतिषपुर (आसाम) में भौमासुर की कैद से सोलह हजार बंदी किशोरियों को मुक्त करके उन बेसहारों का द्वारका में  पुनर्वास और भविष्य में सम्मानित और सुरक्षित जीवन हेतु अपने नाम का मंगलसूत्र बंटवाने (का प्रचार करने) वाले कृष्ण ही हैं।
कृष्ण पर लिखी जाने वाली अनगिनत रचनाओं में काशीनाथ सिंह का ताजा उपन्यास ‘उपसंहार’ भी शामिल हो गया है। इसके नायक वही मिथकीय कृष्ण हैं, जिन्हें पुराणों और महाकाव्यों ने विष्णु का अवतार कहा है। ‘महाभारत’ में भगवान विष्णु की विशेषताओं का विशद वर्णन करने के बाद कहा गया है, ‘‘वे ही भगवान विष्णु दुष्टों का दमन और धर्म संरक्षण करने के लिए मनुष्यों के बीच यदुकुल में अवतीेैर्ण हुए हैं। उन्हीं को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्य स्वरूप, सर्वसमर्थ और विश्ववंदित हैं।’’ (विराट पर्व, अध्याय 272, श्लोक-72)
पिछली फरवरी में संपन्न दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में राजकमल के स्टाल पर जब यह पुस्तक आई तो वहाँ मौजूद किसी विद्वान ने काशीनाथ सिंह से ही पूछा कि एक प्रगतिशील रचनाकार की कलम से ऐसा (शायद प्रतिगामी के अर्थ में) विषय! वहाँ के शोर-शराबे के बीच काशीनाथ सिंह की आवाज सुनाई दे गई कि इस पर कोई भी निर्णय पढ़ने के बाद ही लिया जा सकता है। एक समय उनके आलोचक उन पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि चुके हुए लेखकों द्वारा ही संस्मरणों और ‘काशी का अस्सी’ जैसों का आश्रय लिया जाता है। और जब ‘रेहन पर रग्घू’ और उसके बाद ‘महुआ चरित’ का प्रकाशन हुआ तो फिर से वही लोग यह प्रश्न उठाने लगे कि ‘काशी का अस्सी’ के रचनाकार द्वारा  ‘महुआ चरित’? जहाँ तक मेरी समझ है, काशीनाथ सिंह समय-समय पर अपनी हद खुद से तय करते हैं और जब आलोचक को यह संशय होने लगता है कि बस यही उनकी सीमा है कि तभी अचानक से वे एक ऐसी रचना लेकर आ जाते हैं जो पहले की सीमाओं को तोड़ती-फोड़ती एक दूसरा मानक गढ़ जाती है।
मिथकीय चरित्रों को लेकर लिखी जाने वाली रचनाओं में सबसे बड़ा तत्त्व होता है उसकी प्रासंगिकता और पाठक का उसके पात्रों के साथ साधारणीकरण के तल तक पहुँच जाना। चाहे ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) हो, चाहे अभी हाल में प्रकाशित महेश कटारे का भर्तृहरि को लेकर लिखा गया उपन्यास  ‘कामिनी काय कान्तारे’, कथा में उपस्थित प्रासंगिकता ही उन्हें अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्वकालिक बनाती है। ‘उपसंहार’ को पढ़ते हुए पाठक को उपन्यास के भीतर से बाहर और बाहर से भीतर बार-बार आवाजाही करनी पड़ती है। इस उपन्यास का बीज कब पड़ा इसे तो रचनाकार ही बता सकता है, किंतु इसके प्रकाशन की टाइमिंग कुछ इतर बातें भी सोचने पर विवश करती हैं।
उपन्यास की कथा कृष्ण की तो है किंतु इसके कृष्ण में ब्रज और गोकुल का कम द्वारका का अंश ज्यादा है। और यह द्वारका प्रकारांतर से, किसी अन्य नाम से, आज की राजनीति और उससे भी ज्यादा (कारपोरेट) मीडिया में पूरी तरह धमाचैकड़ी मचाए हुए है। आज की द्वारका ‘हर हर’ के बड़बोले उद्घोष के माध्यम से ‘घर घर’ में पहुँचकर यह सिद्ध करने के लिए आकुल-व्याकुल है कि ‘आर्यावर्त की मुख्यधारा हस्तिानपुर से नहीं द्वारका से निकलती है।’
तथापि यहाँ यह भी विचारणीय है कि महत्वाकांक्षाओं के महाभारतकाल में जहाँ आर्यावर्त में ब्राह्मण, महिलाएँ और बच्चों को छोड़कर कुछ भी नहीं बचा रहा पाया, द्वारका भी विनाश की आग से अछूती नहीं रह सकी और अंत में खुद भी नष्ट हो गई। इस उपन्यास का रूपक शायद आज के संदर्भ में भी  यही इंगित करने का प्रयास करता लग रहा है, हालांकि इसे सिद्ध होना अभी भविष्य के गर्भ में है।
जब अपनी ईश्वरता पर कृष्ण स्वयं प्रश्न उठा सकते हैं तो फिर उनकी महत्वाकांक्षा पर क्यों नहीं बात की जा सकती? कृष्ण स्वयं यह रहस्य खोलें उसके पहले बलराम की यह भत्र्सना द्रष्टव्य है,
‘‘तुम अधर्म की नींव पर धर्म की जर्जर इमारत खड़ी कर रहे थे। कहकर गये थे द्वारका से कि यह अधर्म के विरुद्ध धर्मयुद्ध है, धर्म की स्थापना करनी है। किस धर्म को स्थापित किया? न्याय को? इ्र्रमानदारी को? भईचारे को? प्रेम को? किसको? प्रेमयोग का ज्ञान देते घूम रहे हो और दादा को पोते से, मित्र को मित्र से, गुरु को शिष्य से और भाई को भाई से मरवा रहे हो। पूरे आर्यावर्त में घूम कर देखा मैंने, ब्राह्मणों, महिलाओं और बच्चों को छोड़कर कोई नहीं बचा है। इसे किस धर्म की स्थापना कहेंगे?.................हाँ, इस युद्ध के बाद इतना जरूर हुआ कि जो पहले दबे स्वर में तुम्हें अवतार या ईश्वर कहते थे, वे खुलकर स्तुतिगान करने लगे।....तुम्हें भी अच्छा लगता था और मुझे भी खुशी होती थी कि चलो मेरा छोटा भाई ईश्वर है, मैं ईश्वर का बड़ा भाई हूँ। ...लेकिन एक प्रश्न मेरे मन में बराबर उठता है कि ईश्वर का काम केवल संहार करना है? निरर्थक, निरुद्देश्य, निःस्वार्थ संहार?’’
‘उपसंहार’ के कृष्ण में ईश्वर बनने की जबरर्दस्त एषणा है, लेकिन यह एषणा किसी निजी भौतिक लिप्सा से नहीं, अपने और अपने कुल के अपमान के गर्भ से पैदा हुई है। अपने आदिपुरुष यदु के शापित होकर कुल के क्षत्रियत्व से वंचित होने के कारण उन्हें जगह-जगह क्षत्रिय  राजाओं द्वारा अपमानित होना पड़ता है। उन्हें किसी कर्ता के रूप में नहीं मात्र एक भीड़ का एक बेनाम चेहरा बना दिया जाता है। उनके अंदर यह विचार उठता है कि क्या मनुष्य का मनुष्य होना काफी नहीं है। प्रकारांतर से उनकी ईश्वरता अवतार के विमान से धरती पर नहीं उतरी है, उसे अपमान के पंक ओर पीड़ा से गुजरकर प्राप्त किया गया है। वे यादव, ग्वाले, चरवाहा, रासरचैया, बंसीबजैया सुनते सुनते थक चुके हैं। इस संदर्भ में बलराम की डांट के उत्तर में दिया गया उनका भी वक्तव्य देखा जा सकता है,
‘‘और रही बात ईश्वर की /तो मैं ईश्वर कहो या वासुदेव-होना चाहता था/ क्योंकि उसकी कोई जाति नहीं होती, वर्ण नहीं होता, गोत्र नहीं होता/अकेला वही है जो वर्णाश्रम के बंधनों से मुक्त है/और दाऊ, कोई हारने के लिए नहीं लड़ता/लड़ता है विजय के लिए /और विजय गांडीव के रास्ते नहीं मिलती/मिलती है रणनीति से/जिसे तुम छल कपट, झूठ, अधर्म कहते हो/वे रणनीति के ही अंग हैं और मैंने रणनीतिकार की भूमिका उसी दिन तय कर ली थी जिस दिन स्वयं को निःशस्त्र घोषित किया था।’’
इसका यह अर्थ भी लगाया जा सकता है कि निःशस्त्रीकरण रणनीति के अंतर्गत आता है। यहाँ यह विचारणीय है कि ‘उपसंहार’ के कृष्ण पैराशूटी (अवतारी) ईश्वरता की अवधारणा को ध्वस्त करते हुए इसे नए सिरे से परिभाषित करते दिखाई देते हैं, ‘‘बस यह समझो कि प्रत्येक मनुष्य कभी न कभी कुछ ही पलों या क्षणों के लिए ही सही, किसी न किसी का ईश्वर हुआ करता है। ऐसा एक बार नहीं, कई बार हो सकता है। आखिर ईश्वर है क्या? मनुष्य के श्रेष्ठतम का प्र्रकाश ही तो। और यह प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है। लेकिन फूटता तभी है जब किसी को कातर, बेबस, निरुपाय और प्रताड़ित देखता है। मैं भी था ईश्वर। हाँ मेरी अवधि किन्हीं कारणों से थोड़ी लंबी खिंच गई रही होगी।’’
यहाँ पुस्तक में वर्णित समुद्र, विश्वकर्मा आदि देवताओं का प्रकट होकर उनके द्वारा द्वारका और कृष्ण के ऐश्वर्य को निर्मित करने की मिथकीय रहस्यमयता का रूपक खुलने लगता है और इस मियादी प्रभुता के पराभव काल में, महाभारत युद्ध के लगभग तीन-चार दशक बाद, नाती पोतों और वृद्ध होती अपनी पीढ़ी के बीच, प्रभुता के वे तमाम उपस्करण और उपकरण जब उनका साथ छोड़ने लगते हैं, आत्ममंथन के दौर में अपने अकेले हो चुके ईश्वर और उसके अतीत-कर्म पर प्रश्न उठाने लगते हैं।
यह संशय और द्वैध कभी-कभी चुनौती बनकर उभरता है और उन्हे एक त्रासद   चरित्र में परिवर्तित कर देता है। द्वारका गणराज्य की नारायणी सेना के मृतकों के परिजनों का रुदन मानों यह कहता प्रतीत होता है, ‘‘क्या पता कि हमें उजाड़कर उन्हें भगवान बनना था, उनके तो अस्सी के अस्सियों बेटे संड-मुसंड घूम रहे हैं।’’ नागरिकों की इस कटुक्ति को सुनकर ही शायद जो पहले कभी नहीं कह पाए थे पहली बार कह पाते हैं, ‘‘दारुक, किसी राज्य का महल इतनी ऊँचाई पर नहीं होना चाहिए कि वह लोगों का रोना-गाना न सुन सके।’’ यदि यह रुदन और गायन पहले सुनाई देता तो क्या संहार का महाभारत नहीं घटित होता?
जो भी हो, युद्ध के परिणाम पर वे संशयग्रस्त नहीं, सन्न हैं। हस्तिानपुर में अकाल है, महामारी है। नदियाँ सूख गई हैं। जंगल जल गए हैं, धरती जलकर राख हो गई है और युधिष्ठिर राजधर्म का पालन न करके  तीर्थाटन की बातें कर रहे हैं। तो क्या वह विनाश ऐसे ही राज्य की स्थापना के लिए हुआ था कि लोग चोर-लुटेरों से असुरक्षित भूख से मरते रहें। तब दुर्योधन ही क्या बुरा था? तब क्या उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिए था? क्या वे चाहते तो युद्ध रुक सकता था? ऐसे अनगिनत सवाल उन्हें मथे दे रहे हैं।
ऐसे में धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ की गांधारी याद आती है, जिसने दुर्योधन की मृत्यु के पश्चात कहा था कि ‘कृष्ण, यदि तुम चाहते तो रुक सकता था युद्ध यह।’ ‘उपसंहार’ में भी कृष्ण एक स्थान पर स्वयं से कहते हैं कि वे यदि चाहते तो युद्ध रुक सकता था। जब कृष्ण और बलराम-दो भाई होते हुए मथुरा के स्थान पर द्वारका जैसा सुन्दर नगर बसा सकते हैं फिर पांच भाई होकर पांडव ऐसा क्यों नहीं कर सकते थे। उन्हें भीख में पाँच गांव मांगने की जरूरत ही क्या थी?
......
‘उपसंहार’ अकिंचन से ऐश्वर्य की ओर प्रयाण करने और प्रभुता पाने के क्रम में संवेदनाओं और रिश्तों-नातों के छूटने-टूटने और  पराभव काल में महसूस किये जाने वाले अकेलेपन और असमर्थता का महाआख्यान है। यह बाँसुरी के आह्लादकारी राग के कर्कश पांचजन्य के आतंककारी फुफकार में रूपांतरित हो जाने और असफल प्रेम के ईश्वरता की विध्वंसकारी एषणा में परिवर्तित हो जाने की करुण कथा है।
कृष्ण की भले ही आठ रानियाँ रही हों, द्रौपदी जैसी सखा रही हो, प्रेम तो उन्हें केवल राधा से है। और यह प्रेम अन्य रचनाकारों द्वारा महिमामंडित केवल अलौकिक और अशरीरी प्रेम नहीं। ‘उपसंहार’ में इस प्रेम में देह भी पूरी तरह शामिल है। गोकुल से मथुरा जाना, उस प्रेम को तात्कालिक रूप से स्थगित करना है। ‘जल्दी ही आऊंगा, घबराना नहीं’ के जबाब में ‘तुम क्या आओगे? आऊँगी मैं और तुम्हें ले जाऊँगी’, कहने वाली राधा अन्य रचनाकारों की आम गोपिका नहीं जो किसी संवदिए के समक्ष हजार आंसू रोए। जब कंस-वध के बाद भी कृष्ण नहीं लौटते तो राधा कृष्ण से मिलने स्वयं मथुरा के अतिथि-आगार में जा पहुँचती है। उस समय तक कृष्ण में गोकुल कहीं न कहीं जिन्दा है। इसलिए वहाँ दो भावाकुल प्रेमियों का मिलन है। एक दूसरे की बाहों में समाना है और बहुआयामी चुंबन हैं। लोकलाज, घर गृहस्थी सबकुछ तजकर आई राधा अपनी पूरी देह के साथ कृष्ण के समक्ष समर्पण करने को उत्सुक है, किंतु उसकी बस एक ही शर्त है। यह शर्त है कि प्रेम में अब तक बचा बाकी सब कुछ का समर्पण मथुरा के महल में नहीं जमुना के कछारों में, करील के कुंजों में संपन्न होगा, जहाँ उनका प्यार जनमा है। यह मनुहार शायद शर्त बनकर इसलिए आती है ताकि ईश्वरता के पथ पर चलने को उद्धत कृष्ण वापस गोकुल में लौट आवें और एक साधारण मनुष्य बनकर रहें। हो सकता है संभावित विनाश का पूर्वाभास पाकर इसे रोकने के प्रयास में यह शर्त रखी गई हो। पर होनी को ईश्वर भी नहीं टाल सकते। ‘‘यह कैसे संभव है राधा? बाहर निकलना ठीक नहीं है अभी। मेरे खून के प्यासे हैं कंस के आदमी, रानियों के सेवक-सेविकाएँ, दुर्ग के बाहर जरासंध के गुप्तचर। अभी तो समझ भी नहीं पाया हूँ यहाँ ही राजनीति।’’
यहाँ क्या लगता है? अपने बाल्यकाल में ही ढेर सारे दुश्मनों को मार गिराने वाला कृष्ण, ईश्वर बनने की राह में भयभीत है या  प्रभुता पाने की राह में आनेवाले इस प्रेम की बाधा को तुच्छ जान किनारे कर देना चाहता है? लेकिन राधा अंतिम चाल चलती है, ‘देखो कान्हा, मैं कहीं भागी नहीं जा रही हूँ। रहूँगी बरसाने में ही। इंतजार करूंगी और वहाँ कोई शर्त भी नहीं रहेगी। समझे।’’
लेकिन कृष्ण नहीं समझे। या समझना नहीं चाहा। वे चले जाते हैं और भूल जाते हैं। उन्हें राधा याद आती भी है तो प्रभुता के पराभव-काल में।  प्रेम और विध्वंस एक दूसरे के विरोधी हैं। यह भी हो सकता था कि यह प्रेम महाभारत के विध्वंस से आर्यावर्त को बचा ले जाता। हाँ, कृष्ण जरूर ईश्वर होने से वंचित रह जाते। शायद इसीलिए विध्वंसकारी ईश्वर प्रेम से डरकर भाग गए लेकिन  एक एक करके आठों रानियों में प्रेमयोग की प्रथम दीक्षागुरु की तलाश करते रहे।
विडंबना यह है कि यह विनाश भी उनसे स्वयं संपन्न नहीं हो सका। उन्होंने इसके लिए दूसरों को तैयार किया और  अर्जुन तैयार नहीं हुआ तो ऐन युद्ध से पहले युद्ध के पक्ष में तमाम तर्क देते हुए टेलीपैथी और मेस्मरिज्म के सहारे उसे तैयार किया। गौर करने की बात है कि मथुरा से जो कृष्ण जरासंध के आक्रमण से अपने लोगों को बचाने और शांति से रहने-रखने के उद्देश्य से द्वारका गए  थे, वही कृष्ण अर्जुन को इस विनाशकारी युद्ध के लिए तैयार करते हैं और इसे हमारे शास्त्र और पुराण श्रीमद्भागवतगीता का नाम देते हैं। यह वही गीता है जो बौधकालीन भारत के दौर में गुमनामी की धुंध का शिकार हो गई थी और पुनरुत्थान काल में (आचार्य) शंकर ने इस पर अपना भाष्य लिखकर आर्यावर्त के इस कोने से उस कोने तक भ्रमण करते हुए हिंदुत्व से भी ज्यादा ब्राह्मणवाद और अवतारवाद की पुनस्र्थापना की थी। यह वही गीता है जिसे अहिंसा के  पुजारी मोहनदास करमचंद गांधी अपनी प्रेरणा  का महानतम स्रोत मानते थे और तिलक, अरविन्द, राजगोपालाचारी से लेकर रजनीश तक ने जिस पर अपने-अपने ढंग से टीका-टिप्पणी करते हुए इसे महिमामंडित किया है। यह वही गीता है जिसका जर्मन                                   भाषा में  ड्यूसन द्वारा किया गया अनुवाद पढ़कर शाॅपेनहावर जैसा दुखवादी उत्साह से सड़कों पर नृत्य करने लगा था।
‘उपसंहार’ के कृष्ण उसी गीता के कृष्ण हंै, राधा द्वारा भेंट की गई जिनकी बांसुरी द्वारका तक आते आते कुचले मुंह वाले बांस के हाथ भर के फट्ठे भर रह गई है। और ‘परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ के छद्मवेश में अब उनका पांचजन्य, जिसकी ध्वनि से धरती कांपने लगती थी, पहाड़ हिल उठते थे, समुद्र किनारा छोड़कर भाग खड़ा होता था, विनाशसूचक उद्घोषणा करने लगा है। यह भी जानना दिलचस्प है कि कौन हैं ये साधु जिनके परित्राण के लिए विष्णु को बार-बार अवतार लेना पड़ता है। जाहिर है कि विनष्ट हो चुकी अठारह अक्षौहिणी सेना में शामिल साधारण जन तो नहीं ही रहे होंगे। तब?
महाभारत में साधु की पहचान इस प्रकार बताई  गई है- जो पुरुष (ध्यान दीजिए केवल पुरुष) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि  समस्त सामान्य धर्मों तथा यज्ञ, दान, तप एवं अध्यापन,प्रजापालन आदि अपने-अपने वर्णाश्रम धर्मों का भलीभांति पालन करते हैं, दूसरों का हित करना ही जिनका स्वभाव है, जो सद्गुणों के भंडार और सदाचारी हैं, तथा श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवान के नाम, रूप, गुण, प्रभाव लीला के श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करने वाले भक्त हैं- उनका वाचक यहाँ ‘साधु’ शब्द है।                                                             
       इन गुणों से संपन्न कोई भी साधु पूरे महाभारत में कहीं भी नहीं दिखाई देता। अनंतमूर्ति के प्रसिद्ध  उपन्यास ‘संस्कार’ में नारणप्पा द्वारा इन तथाकथित साधुओं या ब्राह्मणों की बखिया खूब उधेड़ी गई है। ‘उपसंहार’ में भी कृष्ण का एकालाप क्या कहता है, इसे देखना दिलचस्प है,‘‘ये जिसकी दान दक्षिणा और सेवा-सत्कार से प्रसन्न हों उसे नारायण बना दें और जिससे असंतुष्ट हों उसे असुर और राक्षस।’’ दुर्वासा ऐसे ही साधुओं के भी साधु हैं। उनके आदेश से कृष्ण खुद के साथ रुक्मिणी को भी नंगा होने देते हैं और इसी स्थिति में जिस छकड़े पर दुर्वासा बैठे हैं, उसे सरेबाजार खींचते चलते हैं। अराजक और क्रोधी दुर्वासा के जाने के बाद तनावमुक्त हो चुके कृष्ण कहते हैं, ‘‘क्यों आया था? क्या यह जताने आया था कि देख लो अपनी औकात/हम  हैं जो तुम्हें ईश्वर बना सकते हैं/तो मटियामेट भी कर सकते हें./....आप ब्राह्मण हंै इसीलिए आवध्य हैं?/आपने अपने पास शाप या वरदान देने की ऐसी शक्ति रख ली है/ जिसकी काट सृष्टि के पास नहीं  हैै/  न उसका कुछ खड्ग बिगाड़ सकता है, न तीर धनुष/यह कैसी मानव संहिता बनाई है मुनिवर।’
       और मजाक के मूड में कृष्ण-पुत्र साम्ब जब जंगल में ऋषियों को छेड़ता है तो वे  उसे पहचानकर पूरे यदुकुल को ही विनष्ट होने का शाप दे डालते हैं। इस घटना पर कृष्ण कहते हैं, ‘‘यहीं चूक हुई तुमसे/ वे हँसी मजाक नहीं जानते/ वे कमंडल में शाप और मृत्यु लिए घूमते रहते हैं। ऋषि हैं, सिर्फ रोष करना जानते हैं।’’ अगर ये ऋषि और साधु इतने ही शक्तिशाली हैं तो फिर इन्हें अपनी रक्षा के लिए किसी अवतार की आवश्यकता क्यों पड़ती है, ये तो कमंडलों में रखे शाप और मृत्यु से अपने विरोधियों का स्वयं विनाश कर सकते थे। यह भी  तो हो सकता है इनकी यह शक्ति अपने उन संकटमोचक भक्तों पर ही काम करती हो। तब ऐसे दुष्ट और एहसानफरामोशों की रक्षा की जरूरत ही क्यों होती है? मुझे तो यह पूरा का पूरा मिथक-तंत्र ही एक ऐसा इन्द्रजाल लगता है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं।
गांधारी का शाप नाकाफी था। अब इन ऋषियों का शाप कैसे झूठा साबित हो सकता है? लेकिन ‘उपसंहार’ में खुद बलराम ने भी सावधान किया था, ‘‘और क्या, समझते हो, जो कुछ कुरुक्षेत्र में हुआ है, या तुमने किया है, द्वारका उससे अछूती रहेगी?’’
       धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ में गांधारी के शाप को शिरोधार्य करते हुए (मानों स्वीकार करने पर ही शाप असरकारक होता हो) कृष्ण कहते हैं,
‘अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ, करोड़ों बार
जितनी बार जो भी सैनिक धराशायी हुआ
कोई नहीं था वह मैं ही था
गिरता था घायल होकर
                                जो रणभूमि मंे। 

‘उपसंहार’ में यह ‘मार भी वही रहे हैं और मर भी वही रहे हैं’ लौकिक प्रमाण के साथ आता है। महाभारत के युद्ध के तीसरे दिन के बाद से कृष्ण के रथ पर बैठे अर्जुन जहाँ भी आक्रमण करते हैं, अपने सामने कौरवों की ओर से द्वारका की नारायणी सेना को पाते हैं और कृष्ण से अर्जुन के हाथों अपनी ही सेना का संहार होते जब नहीं देखा जाता तो चैथे दिन का युद्ध स्थगित होने पर भीष्म से कह उठते हैं कि यह ठीक नहीं हो रहा। भीष्म का उत्तर कृष्ण को निरुत्तर कर देने के लिए काफी है, ‘‘वासुदेव! ठीक तो बहुत कुछ नहीं हो रहा है/अब्बल तो तुम्हें कहना ही नहीं चाहिए था लेकिन कहा तो सुनो/किसको किस मोर्चे पर लड़ना है व्यूह रचना में कौन कहाँ होगा/इसका निर्णय कौरव करेंगे तुम नहीं/और वासुदेव यह न भूलो कि तुम और नारायणी सेना एक कुल हो/तो कौरव और पांडव भी एक कुल हैं।’’
       जो भी हो ‘उपसंहार’ के कृष्ण का अकेलापन वह आत्मनिर्वासन नहीं है जिसे दोस्तोवस्की ने आस्तित्ववादी दर्शन के संदर्भ में कहा था। तमाम संशयों और आत्मप्रताड़ना के बाद भी कृष्ण आस्थावान हैं। उनकी इस आस्था में देवत्व से ज्यादा मनुष्यत्व का अंश है। उनके लिए यह संसार उनका अपना संसार है। वे यहाँ बाहरी आदमी के रूप में न रहते हैं न दिखाई देते हैं। उन्होंने स्वर्ग के समान द्वारका का निर्माण जरूर किया है, किंतु उन्हें स्वर्ग से ज्यादा यह मृत्युलोक प्यारा है। उन्हें इस पर गर्व है। कृष्ण के जीने में कर्ता के भाव का लोप,साक्षी भाव या टीएस एलियट के शब्द में कहें तो निर्वैयक्तिकता का अंदाज है। इसी अंदाज में वे भाई, पिता, प्रेमी, पुत्र, पति, मित्र, सखा आदि की भूमिका निभाते हैं। और इसी संदर्भ में कृष्ण की द्वारका आज की द्वारका से नितांत विलग दिखाई देती है।
यहाँ तक कि जिस महाविनाश की चर्चा महाभारत में हुई है उसे भी वे प्राकृतिक मानते हैं। युद्ध को नहीं रोक पाने का पश्चाताप भी उनके भीतर अंत तक नहीं आ पाता।
       ‘उपसंहार’ के कृष्ण ने द्वारका में जातिविहीन गणराज्य की स्थापना करने का प्रयास किया था। किंतु वह अराजकता और भीड़तंत्र में बदल गया। अब उसका भी विनाश होना अवश्यम्भावी था। साम्ब प्रकरण में उनका वक्तव्य उनके जीवन-दर्शन का ‘उपसंहार’ माना जा सकता है। ‘‘देखो साम्ब! मरता वही है जो पैदा होता है। जो पैदा नहीं होता वह मरेगा कैसे? जैसे स्वर्ग! न वहाँ कोई पैदा होता है, न मरता है। पता नहीं कोई जीता भी है या नहीं। वह बंजर प्रदेश है। यह मृत्युलोक है। इसी को सृष्टि कहते हैं। जीवन यहीं है और जीवन जीने के लिए होता है। इसलिए होता है कि जिया जाए- रस लेकर, मजे लेकर। इसलिए नहीं कि मरते दम तक रोते रहें, कराहते रहें, तड़पते रहें। आह-उह करते रहें। तो मरने की चिंता में जीना स्थगित मत करो। हाँ, दूसरे के जीने में खलल न पड़े इतना ध्यान रहे। रही बात द्वारका के नष्ट होने की, तो बेटा होता ही इसलिए है कि बाप के किए कराए पर पानी फेर दे, उसके बने बनाए घरौंदे को तोड़-फोड़ दे। संभव है, इसके बाद जो बने इससे बेहतर बने और टूटेगा नहीं तो बनेगा कहाँ से?’’
       यह उनका अंतिम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्बोधन है। उन्हें इस सत्य का पता चल चुका है कि ईश्वर की भूमिका में वो मात्र एक अभिनेता थे। जैसे ही मंचन समाप्त हुआ उनसे सारी नाट्य-सामग्री ले ली गई और अदृश्य निदेशक द्वारा यह कह दिया गया कि आप घर जाएँ, अब आपकी जरूरत नहीं। इतना सब कुछ समझने के बाद, अपने आदिवासी सौतेले भाई जरा (जरा का मतलब वृद्ध भी होता है) का तीर लगने पर वे मरणासन्न अवस्था में भी जिज्ञासु की भांति आचरण करते हैं और कहते हैं कि जब मैं ही नहीं समझ सका इस जीवन और जगत के रहस्य को, तो भला दूसरा कोई क्या समझेगा?’
मैथिली शरण गुप्त के लिए सहज संभाव्य रहा होगा,हमारे समयों में तो राम, कृष्ण या किसी भी ईश्वर पर लिखना असहज और कठिन है। कृष्ण पर शायद यह पहला आख्यान है, जिसे पढ़ते हुए पाठक अंध श्रद्धा रखने वाला भक्त नहीं बल्कि मात्र जिज्ञासु पाठक बनकर कृष्ण के समीप पहुँचता जान पड़ता है। हम सभी के भीतर एक न एक लघु महाभारत मौजूद रहा करता है जिसमें हमने कभी दुर्योधन कभी अर्जुन तो कभी कृष्ण की भूमिका में जीवन जिया होता है। हम सभी के पास कोई न कोई बांसुरी भी रहा करती है, जो महत्वाकांक्षाओं के युद्ध में कूदने से पहले छूट जाया करती है, और जब फिर से उसकी याद आती है तब न तो हमारी और न उसकी ऐसी स्थिति होती है कि कोई भी राग निकल सके। ‘उपसंहार’ में कृष्ण जो भी सोचते हैं करते हैं, वह प्रभु के नहीं मनुष्य के ज्यादा करीब लगता है। हमें लगता है, अगर हम उनकी भूमिका में होते तो शायद वही सोचते-करते जो कृष्ण सोचते और करते हैं। इस पुस्तक की प्रासंगिकता और सफलता शायद इसी भाव और भाषा के आधुनिक बोध में निहित  है।                                                                                             
                                                --    तद्भव, (2014)

Saturday, 27 April 2013

कहानी - कबिरा पडा बाजार में

कहानी

कबिरा पड़ा बाजार में
नारायण सिंह

       वह शाम के धुंधलके का वक्त था, जब इया को अविनाश ने मेरे घर पहुँचाया। संयोग से उस समय नागदेव और सुरेश भी मौजूद थे। दोनों ने मिलकर उसे कार से निकाला और मेरे कहे मुताबिक भीतर के बरामदे में बिछी चैकी पर लिटा दिया। कंपनी के क्वार्टर में हालांकि काफी जगह थी, आगे-पीछे बरामदे, पीछे बहुत बड़ा सा आंगन लेकिन कमरे बड़े-बड़े होने के बावजूद कुल दो ही थे। एक कमरा मेरे पढ़ने-लिखने और सोने के साथ-साथ बैठने का भी काम देता तो दूसरे में बेटी का अपनी माँ के साथ रहना और पढ़ना हुआ करता। बाहर वाले बरामदे के एक कोने में आठ बाई छह की एक कोठरी थी जिस पर छोटे बेटे ने अपने बड़े भाई के बीएचयू जाने के बाद कब्जा जमा लिया था। इया की हालत देखते हुए हमें उसके लिए सबसे उपयुक्त जगह पिछले बरामदे में बिछी वह चैकी ही लगी जहाँ से बाथरूम बिल्कुल पास था।
       अविनाश के जाने के बाद पत्नी ने इया के नजदीक जाकर पूछा-इया जी, कुछ चाहीं?
       इया के कंठ से कोई अस्पष्ट सी आवाज निकली और उन्होंने बिना हिले-डुले बिस्तर गीला कर दिया। मुझे यह हरकत नागवार गुजरी; लेकिन जब हमने उन्हें उठाना चाहा तो हमें उनकी मजबूरी का पता चला। उनके पैर जवाब दे चुके थे। गीले कपड़े बदलते वक्त हमने देखा उनकी पीठ पर नीचे की ओर एक गहरा जख्म है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े रेंग रहे हैं। मैंने झुंझलाते हुए पूछा-ऐसी हालत कैसे हुई? हमारे यहाँ पहले ही कोई खबर क्यों नहीं भेजी?
       उसकी जुबान से एक अस्पष्ट आवाज फिर से निकली। साथ ही, उनकी आँख के कोरों से आँसू ढरकने लगे। यानी अब हमें उनकी वह आवाज कभी नहीं सुनाई दे पाएगी, जो कभी भीतर गुदगुदी तो कभी आहत कर दिया करती थी। मुझे अविनाश का स्वभाव  पता है। सबको यह अनुमान था कि इया के पास गहने और धन जमा है। शायद उसकी लालच में वह उसे गाँव से अपने यहाँ उठा लाया हो और जब चलना-फिरना बोलना बंद हो गया तो यहाँ लाकर डाल गया हो। वह ऐसा वक्त था, जब मैं अपने बच्चों के कैरियर को लेकर इतना व्यस्त और चिंतित था कि मेरे लिए खुद के बीमार होने के बारे में भी सोचना गवारा नहीं था।
       हम उन्हें अस्पताल ले गए। एमर्जेन्सी में मेरे एक परिचित डाक्टर मिल गए। उन्होंने अच्छे से जांच करने के बाद पूछा, ‘‘यह बेड सोल कितने दिनों से बल्कि कितने महीने से है?’’
       - मुझे नहीं मालूम, सर। यह मेरे भतीजे के पास पिछले छह माह से थी। मेरे यहाँ तो अभी एक घंटे पहले आई है। वह पहुँचाकर बाहर से भाग गया। हमें कुछ पूछने का भी मौका नहीं दिया।
       - कितनी उम्र होगी? - उन्होंने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।
       - यही कोई नब्बे और सौ के बीच में .........।
       - तब आप क्या चाहते हैं? डाक्टर ने मुस्कराते हुए पूछा।
       - क्या मतलब?
       - मतलब यह कि अब इन्हें घर ले जाइए। राम-राम कहिए। आप तो यह सब नहीं मानते वरना कहता कि तुलसी दल सिरहाने रखकर इंतजार कीजिए। अब भगवान  के घर इनकी विदाई कभी भी हो सकती है। वैसे अभी भी इनके बाल अधपके हैं, अधिकांश दांत  भी सलामत हैं। आँखें भी ठीक लग रही हैं। बस यही बेडसोल है जो जानलेवा बन चुका है। महीने-डेढ़ महीने से कम पुराना क्या होगा? एक पाउडर लिख देता हूँ। कीड़े मर जाएंगे। लेकिन अब कुछ भी ऐसा ही है, जैसे सूखे पेड़ में पानी देना।
       इया को वापस लाकर फिर उसी चैकी पर लिटा दिया गया। लिटाते वक्त उसके मुँह  से वही आवाज दो बार फिर से निकली। आवाज पर हमने गौर किया तो कुछ-कुछ लगा कि वह शब्द ‘डर’ या फिर ‘घर’ दोनों में से कोई एक है। इया को डरते हुए हमने शायद ही कभी देखा हो। वह गाँव में उन दस कोठरियों वाले मकान में पिछले पचीस वर्षों से अकेले रह रही थी, जिनमें दिन में भी अंधेरा रहा करता था और हमें अकेले भय लगा करता था। निश्चित रूप से वह शब्द ‘घर’ ही रहा होगा क्योंकि सभी को पता है कि इया के प्राण उस घर में बसा करते हैं।
स्वीट होम
       इया को देवी-देवताओं और बाबा के बाद यदि किसी पर भरोसा था तो यह वह मकान ही था, जिसके प्रवेश-द्वार की दीवार पर ऊपरी आलेनुमा भाग में सीमेन्ट से बाबा का नाम उकेरा गया था, अपने निरक्षर होने के बावजूद जिसकी जानकारी उसे थी और जब कभी कोई उसे नाराज कर देता तो कहा करती कि यह मकान मेरे पति का है, इसलिए कोई भी इससे मुझे बेदखल नहीं कर सकता और बाकियों को इस घर में रहना है तो उन्हें मेरे अनुसार चलना होगा। लेकिन ऐसा कहने के लिए इया को तब तक इंतजार करना पड़ा जब तक मां नहीं मरी। 
       गाँव के उत्तरी छोर पर बना यह मकान भाइयों के लिए स्टेटस सिम्बल और स्थायी पहचान था तो बहनों के लिए नैहर की साख एवं बचपन की स्मृतियों का एक झरोखा। इसके साथ मेरा रिश्ता एक रहस्यमय आसक्ति और अनासक्ति का था जिसमें शंकाएँ, न भूलने वाली उदास स्मृतियाँ और सपने शामिल थे, बचपन के समय मैंने इसकी दालान में नितांत अकेले मेंचुप दीवारों को अपना संगी बनाते हुए उन पर गेंद के न जाने कितने प्रहार किए होंगे।
       बचपन से वयस्क होने तक की अवधि में, भले ही वह क्षण विरले ही क्यों न हो, जब कभी भी मैं पीठ के बल उस मकान की छत पर गर्मियों की रात में लेटता तो आसमान में तारे जितने साफ-साफ दिखाई देते उतने मैंने आज तक अन्यत्र किसी जगह से नहीं देख पाया हूँ। सप्तर्षिमंडल, आकाशगंगा, एक ही जगह पर शाश्वत रूप से अचल रहने वाला धु्रवतारा और सुबह की मुनादी करने वाला सुकवा (शुक्रतारा) इन सबकी पहचान हमने उसी छत पर से की थी।
       मकान की छत पर से गाँव के उत्तरी सीवान को छूकर गुजरने वाली, ऊँचे बाँध की तरह निर्मित की गई वह नई रेल लाइन भी दिन की रोशनी में दिखाई देती, जो पूरब में कलकत्ता तो पश्चिम में देश की राजधानी से जा मिलती थी। यह नेताओं, अफसरों और अखबारों की भाषा में विकास की जीवन-रेखा के नाम से जानी जाती थी और इसके प्रति हमारा आकर्षण किसी अहित करने वाली वस्तु के प्रति आकर्षण जैसा या फिर भूख-प्यास और दिन के चैन के साथ रातों की नींद छीन लेने वाली प्रेमिका जैसा था।
       इस के बावजूद कि गाँव के पास के एक एकड़ जमीन में लगा हमारा आमों का बाग और तीनफसली तीन एकड़ खेत इसके पेटे में समा चुके हैं, इस रेल लाइन और इस पर दौड़ने वाली गाड़ी के प्रति हमारा लगाव ऐसा था कि जब भी हम-मैं और दोनों बहनें आंगन में खाना खा रहे होते और पूरब में गाँव के सीवान पर स्थित जटहवा बाबा के मोड़ पर जब कोयले वाला इंजन जोर से सीटी मारता तो हम अपना खाना छोड़कर सीढ़ियाँ फलांगते इस मकान की छत पर जा पहुँचते और उत्तरी रेलिंग से चिपककर रेलगाड़ी की आवाज के संगीत में तब तक डूबे रहते जब तक वह कानों से बिल्कुल ओझल नहीं हो जाया करती थी। रात के समय हमें वही रेलगाड़ी रोशनडिब्बियों की चलती हुई एक तेज रफ्तार कतार लगा करती जिसमें सवार होकर हम सपनों के स्टेशन पर पहुँच जाया करते थे।
       लेकिन उस घर के साथ मेरा एक और भी रिश्ता था। मैंने उसके अलग-अलग तीन कमरों में अपने तीन-तीन अजीजों को बारी-बारी से आखिरी साँस लेते हुए देखा था। माँ के समय मैं पाँच वर्ष का था तो बड़ी बहन के समय दस वर्ष का। दोनों बड़े भाइयों के बाद  की वह बहन बरसात के दिनों में बाढ़ से उफान मारते खन्ते-भागड़ के पानी में मुझे तैरने सिखाने के लिए अकेला छोड़ देती और जब मैं नाकाम रहता तो अपनी पीठ पर साड़ी के आँचल से बांधकर एक किनारे से दूसरे किनारे तैरती हुई चली  जाती। मैं उसमें बहुत दिनों तक अपनी मृत माँ की छवि देखता रहा था। शादी के बाद उसे टी.बी. हो गई और दहेज के लिए नाराज चलने वाले उसकी ससुराल वाले उसे हमारे घर पर छोड़ गए े। तब के दिनों में यह बीमारी या तो लाइलाज मानी जाती होगी या फिर बड़े शहरों में इलाज करवाने का बड़ा खर्चा हमारे घर की आर्थिक स्थिति के अनुकूल नहीं रहा होगा, इसलिए उसे मृत्यु के इंतजार में दिन गिनने के लिए छोड़ दिया गया था। हमारे यहाँ का उसका करीब छह माह का जीवन बहुत ही पीड़ा में गुजरा। उसके सिर में किसी किसी रोज भयंकर पीड़ा होती और अनाप-सनाप गालियाँ  निकालना शुरू कर देती, जिनका निशाना अक्सर हमारे पिता और भगवान हुआ करते  जिन्होंने मिलकर उसे पैदा किया था। वैसी हालत में बाबा बेचैन हो जाते और पास के गाँव बैजनाथपुर में रहने वाले डाक्टर ज्वाला प्रसाद के यहाँ से होमियोपैथी की छोटी-छोटी और मीठी-मीठी गोलियाँ लाकर दीदी के मुँह में खुराक के हिसाब से डालते रहते।
       जब दीदी की घरघराती साँसों की आवाज हमेशा के लिए थमी तो मैं उस वक्त   पंडित बरमेश्वर दुबे के कहने पर रामचरित मानस के सुंदर कांड का पाठ कर रहा था। दीदी के जाने के डेढ़-दो महीने बाद जब बाबा जाने लगे तो  उस वक्त तक मुझे मृत्यु के बारे में थोड़ी-थोड़ी जानकारी हासिल हो चुकी थी।
       उन दिनों गाँव के कुछ लोग दबी जुबान में यह भी कहना शुरू कर चुके थे कि हमारा वह मकान शापित हो गया है। इसकी पृष्ठभूमि के तौर पर वे एक घटना का जिक्र किया करते। जब यह मकान बन रहा था तो उसके दक्षिणी पश्चिमी कोने पर नींव से सटा, बाहर एक कुआँ था जो आज भी मौजूद तो है लेकिन कूडे़-कचरे और दीवारों में उग आई पीपल-पाकड़ की मोटी-मोटी टहनियों के कारण अंधकूप में बदल गया है। मकान बनते समय वह अपने शबाब पर था।
       सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन घर बनाने वालों में से एक मजदूर कुएँ में गिर पड़ा। उसे गिरते हुए किसी ने नहीं देखा होगा, क्योंकि उसकी खोज तब शुरू हुई जब कुएँ के पास रखे गए ड्रम का पानी खत्म हो गया और वह खोजने पर भी नहीं मिला। तब तक श्री राम बो कमकरिन ने शोर मचाया कि कुएँ में कोई बड़ी सी चीज तैर रही है। उड़ाह में पारंगत गाँव के दो तैराकों ने उसे निकाला तो देखा गया कि वह वही मजदूर है। अंतिम आस में उसे चारपाई पर लादकर रेल लाइन  के उस पार बिशुनपुरा गाँव ले जाया गया, जहाँ कुम्हारों के घर थे। वहाँ उसे देर तक चाक पर घुमाया गया, लेकिन न तो फूले हुए पेट का पानी बाहर निकला और न तो उसकी साँस ही वापस आई। वह उसी गाँव का रहने वाला था और उसकी माँ तब तक पहुँच चुकी थी। वह अपनी छाती पीट-पीट कर रोती हुई सरापती जा रही थी-हमार त करम फूट गइल! सबके मालूम रहे कि हमरा बचवा के मिरगी आवेला त पानी खींचे के काम में काहे के लगवले रे निरदइया। तोर आदी औलादी ओ घर के हबेखे ना पावे रे मुदइया। (मेरे तो करम फूट गए। जब सबको मालूम था कि मेरे बेटे को मिरगी की बीमारी है तो फिर निर्दयी लोगों ने उसे कुएँ से पानी निकालने के काम में क्यों लगाया? जिस निर्दयी ने मेरे पुत्र की बलि ली है, उसकी संतानें उस घर का उपभोग नहीं करें, ऐसा मेरा शाप है।)
       यह कहने में कोई हिचक नहीं कि वह मकान थोड़ा पाकर भी अपने आप में संतुष्ट रहने वाले भव्य अतीत के खंडहर पर तैयार हुआ था, जिसमें घर की गायों के जाए दस-ग्यारह अंड़ुआ बैलों और तीन बाबाओं के सम्मिलित श्रम के जोर पर पैदा हुए भांड़-छूंड़ और कोठिलों में भरे अनाज और गायों के थन से निकले कुंडों में औंटाते दूध की सीली-सोंधी महक हवा के साथ लहकती-बहकती रहती थी। लेकिन घर में पत्नी बनकर आईं पराए गाँवों की स्त्रियों के आपसी झगड़ों के कारण परिवार के बंटने की नौबत आ गई। पिता और दो चाचाओं के नौकरी में होने और बाबा लोगों के उम्रदराज होते जाने के कारण परिवार की यह राय बनी कि अगर खेती जारी रखनी हो तो मेरे भाइयों की पीढ़ी को खेती में जोत दिया जाना चाहिए। बड़े बाबाओं के परिवार को भले मंजूर हो, लेकिन माँ ने साफ इन्कार कर दिया। तब बड़े भाई साहब ने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी और वे बनारस के कमच्छा कालेज में पढ़ रहे थे जबकि मझले भाई साहब का इस वर्ष बनारस के ही राजपूत कालेज में ऐडमिशन होने वाला था। माँ की जिद थी कि खेती हो चाहे न हो दोनों लड़के पढ़ाई छोड़कर खेती में नहीं आएंगे।
       पहले चूल्हे अलग हुए, फिर खेत और माल-मवेशी और तब आखीर में घर। बाबा के हिस्से भूसा रखने वाला कच्चा मकान मिला, जहाँ आए दिन बड़े-बड़े गेंहुअन साँप निकला करते और बाबा लाठी लेकर रात-रात भर पहरेदारी किया करते थे। पिता ने अभाव के बावजूद कोलियरी से ट्रक पर कोयला भिजवाया और वहीं के मिस्त्रियों को यहाँ भेजा ताकि कोयले से ईंट के भट्ठे बनाकर मकान बनाया जा सके। चूंकि बाबा पर उनका विश्वास नहीं था, इसलिए देखरेख करने की जिम्मेवारी हमारे एक  मामा को सौंपी। लेकिन नया मकान बनना अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि भैया लोगों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही, परिस्थितिवश नौकरी पकड़ लेनी पड़ी और बाकी बची दोनों बहनें भी शादी के बाद अपने-अपने घर विदा हुई। वे आज जिंदा हैं और उन्हें आज भी इस बात का मलाल है माई ने बेटों के पढ़ने के लिए तो झगड़ा किया लेकिन बेटियों को गाँव के प्राइमरी स्कूल से आगे नहीं पढ़ाया। वे सोचती हैं कि वह पढ़ाई ही थी जिसके चलते वे अपने भाइयों के परिवार से काफी पीछे छूट गई हैं। 

बाबा हो बाबा!
       बाबा की मृत्यु से लगभग छह माह पहले जब मैं पिता के साथ गाँव आया हुआ था, बाबा ने पिता से कहा बबुआ! हमारी तो एक भी बात नहीं मानते लेकिन आखीर में एगो बात कहते हैं कि जदी अचक्के हमारा प्रान छूट जाए तो अपने परिवार का कोई भी आग देने वाला नहीं होगा। लोग तुम पर ही हँसेंगे कि नाती-पोता रहते हुए मुझे आग देने वाला कोई नहीं मिला। तो इस छोटे को मेरे पास रहने दोगे तो हमारे प्राण शांति से निकलेंगे। और यह मेला स्कूल में पढ़ भी तो सकता है। 
       पिता जब राजी हुए तो मैं यह सोचकर खुश हुआ कि पिता की जेल से छुटकारा मिल गया है। मुझे सवाल आते नहीं थे और नहीं आने पर पिटाई होती थी। यहाँ बाबा के पास फसलों के साथ-साथ स्नेह की खेती लहलहाया करती थी। वे मुझे खेतों में ले जाते। कभी अपने कंधों पर बैठाते तो कभी घोड़ी पर। हल की मूँठ मैंने उनके साथ-साथ पकड़नी सीख ली थी। दूसरे दोनों बाबाओं के परिवारों के हम उम्र चचेरे भाई माधो, गिरिधर और नागा के साथ कभी अमरूद के बगीचे में तो कभी कोल्हू में ईख डालने धमाचैकड़ी मचती। सूखे पतों की आग वाले चूल्हे के ऊपर रखे विशाल कड़ाह में, जब दिन ढलने लगता, गन्ने का रस खौल-खौलकर गाढ़ा हो जाता तो केले के पत्तों पर हमें गर्म-गर्म राब और अंत में गुड़ मिलता। शाम को लौटते समय भरकस के सहारे घोड़ी की पीठ के दोनों ओर कुछ न कुछ लटका होता; कभी गुड़ तो कभी अनाज या फिर जलावन के लिए अरहर की झाँखियाँ या मवेशियों के लिए हरा चारा। घोड़ी  के अलावे हमारे पास अब एक गाय और एक बैल भर बच गए थे। चरन और नाद में सुबह-शाम घास-भूसा-पानी तीनों मवेशियों  के आगे डाल दिया जाता। उसमें भूसी, खली और हड़दोहन मिलाते वक्त मैं बाबा के साथ-साथ लगा रहता। शुरू-शुरू में बड़ी सींगों और कजरारी बड़ी-बड़ी आँखों वाला वह बैल हूँफते हुए मेरी ओर झपटा तो बाबा ने उसे डाँटते हुए कहा - पागल हो गए हैं क्या जो घर का भी लड़का पहचान में नहीं आता? पिटाने का मन है क्या? 
       बाद में वह मेरा दोस्त बन गया। मुझे गुदगुदी होती और वह था कि जोर-जोर से सांस छोड़ता मेरे हाथ में लगी खली-भूसी अपनी खुर्दरी जीभ से चाटता रहता। हमारे लिए वही सब खेल थे, खिलौने थे और आज की भांति न तो बाजार हमारे आस-पास हुआ करता था और न हमें उसमें बिकने वाले तरह-तरह के खिलौनों के बारे में कुछ जानकारी थी।
       बाबा दालान में बिछी पटिहाट पर रात को मुझे अपने साथ सुलाया करते और आस-पास मौजूद झिंगुरों की झनझनाहट के बीच बड़े ही रोचक ढंग से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के साथ गाँव से जुड़ी घटनाओं को सुनाया करते। वे मुझसे कहा करते कि आदमी बनने को पढ़ना तो जरूरी है लेकिन यह जरूरी नहीं कि पढ़ने-लिखने के बाद शहर में नौकरी ही की जाय और अपने खेत-बधार बटइया पर दे दिए जायं। ढेर सारे पैसे कमाने वाले भी तो खाते हैं अनाज ही न। और मनोहर। जरूरत से ज्यादा पैसे आदमी के संस्कार को खराब कर दिया करते हैं।
       मुझे इस बात पर पिताजी याद आते, जिनके साथ पिछली बार बाबा की कहा सुनी  हो गई थी, जब पिता जी वापस कोलियरी लौट रहे थे। पिता ने कहा कि ‘अब खेती में कोई बचत और भविष्य नहीं है। वैसे भी रेल लाइन में नजदीक के अधिकांश खेत चले गए हैं। अब आप बूढ़े भी हो गए हैं, थक रहे हैं। आराम करिए और राम राम भजिए। अब बाकी बचे मवेशियों को बेच दीजिए और खेत बटइया और लगान पर देकर हलवाहे को छुट्टी दे दीजिए। देखिए सूबेदार साहब को। रिटायर होकर पूजा-पाठ में लीन हैं।’
       वह ढलती दोपहरी का वक्त था और बाबा खेत से लौटकर आंगन में आलथी-पालथी मारे सत्तू खा रहे थे। उन्होंने खाते-खाते जवाब दिया - हम किसी के नौकर नहीं किसान हैं, गृहस्थ हैं। हमारे काम में कोई रिटायर नहीं होता। और मेरे लिए मेरा काम ही राम का नाम है, मेरे खेत ही भगवान हैं, जिनसे आज तक परिवार का पेट चलता रहा है और आप इस लायक हुए हैं। यह मेरा काम नहीं कि जवानी में गलत काम करूँ और बुढ़ापे में राम-राम जपूँ।
       पता नहीं पिता को उनकी बात का इतना बुरा क्यों लगा कि वे हत्थे से उखड़ गए और बाबा को गालियाँ तक दे डालीं। बाबा हक्का-बक्का रह गए और बीच में ही खाना छोड़कर उठ गए और आस्तीन से आँखें पोंछते हुए पानी भरा लोटा लेकर घर के बाहर निकल गए।
       कहानी सुनाते-सुनाते एक शाम बाबा ने मुझसे कहा, ‘‘बेटा मनोहर। तुम अपनी इया का ख्याल रखना बबुआ। यह औरत मुँह की तीत है, लेकिन मन में कोई छल-कपट नहीं है। इसे अगले जनम की फिकर ज्यादा है। इसको स्वर्ग चाहिए, मोक्ष चाहिए। गंगा-सरयू नहाना और घंटा भर पूजा-पाठ। घर परिवार की कोई चिंता नहीं। लेकिन इसमें इसका दोष कम है। पहले तो गाँव की औरतों से झगड़ा कर लेगी और जब कोई औरत इसे बांझ कह देगी तो घर में बैठकर भोंकर-भोंकर के रोने लगेगी, जैसे बच्चा हो। हमसे अठारह-बीस वर्ष छोटी औरत से शादी कराके हमारे  बाबू और भाई लोगों ने अच्छा नहीं किया। वह भी तब जब तुम्हारे बाप पोसा-पला के आठ बरस के हो गए थे। एऽ बचवा। हमारे ना रहने पर इसका ख्याल रखना।....... अब तुम्हारे ऊपर ही भरोसा  है।’’
       लगभग पचास साल हो गए उस छहफुटे गोरे चिट्टे शख्स यानी हमारे बाबा को  गुजरे हुए, जो पचहत्तर साल की उम्र में चोटिल हड्डियों के बावजूद तीन कोस दूर के खेतों में जाया-आया करते थे, जिन्होंने बिना किसी उज्र-एतराज के किसानी की तमाम नैसर्गिक विपत्तियाँ झेली थीं और टस से मस नहीं हुए थे, जिन्होंने अपनी जवान पत्नी की मौत का सदमा खामोशी के साथ बरदाश्त कर लिया था जब उनकी दो बेटियों के बाद पैदा हुए मेरे पिता मात्र छह महीने के थे, जिन्होंने अपने हलवाहे शिवजतन, जिन्हें हम जतन काका कहकर पुकारते थे, के ऊपर होने वाले अन्याय के विरोध में अपने ऊपर पट्टीदार विपक्षियों की एक साथ सात-सात लाठियों के वार सहे थे, लेकिन जैसा कि गाँव के लोगों ने बाद में कहा था, जब उन ग्यारह बैलों में से हमारे हिस्से के उस आखिरी बैल के बिकने की मजबूरी आई (और यह वक्त जानबूझकर तब निकाला गया था जब मैं स्कूल गया हुआ था) और वह बैल खरीदार के साथ जाने के बजाय उस पर अपनी सींगें तानकर पिल पड़ा तो उस शख्स यानी बाबा ने पहली बार उस पर पैने से वार किया था - एक, दो, तीन और लोगों ने बाद में कहा था कि उसके तुरंत बाद वे दोनों-बाबा और बैल अपनी-अपनी जगह एक दूसरे से नजरें चुराते हुए चित्रलिखित खड़े रह गए थे, और तब वह बैल यह समझते हुए कि अब इस घर से उसके दाना-पानी उठने का वक्त आ गया है, चुपचाप खरीदार के पीछे-पीछे सिर झुकाए चला गया था और बाबा उसके जाने के बाद दालान में आकर पटिहाट पर ढह गए थे और दो दिन बाद उठे भी तो चार लोगों के कंधों पर। उनके निष्प्राण शरीर पर घी का लेप लगाने से पहले निकाली गई बंडी की दाहिनी जेब में सौ और पचास के एक-एक नोट ज्यों के त्यों रखे मिले थे, जो बैल की एवज में मिले थे। बाद में लोगों ने यह भी कहा था कि बाबा के प्राण उनके बैलों में बसा करते थे।
       बाबा के चले जाने के लगभग छह साल बाद परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि पिता को कोलियरी छोड़कर गाँव के मकान में स्थायी बसेरा बनाने की तैयारी करनी पड़ी। लेकिन उनकी जगह उनके मौत की खबर आई।
       उस साल गाँव में आम खूब आए हुए थे और मैं बगीचे में बचे पेड़ को अगोरने का काम कर रहा था। बड़े भाई सपरिवार आए हुए थे और पिता की मौत सुनकर मझले भाई भी क्रियाकाम से पहले आ गए थे। 
       पिता के श्राद्ध के अगले दिन इया पड़ोस के तीन पंचों को बुला लाई और उनके सामने भाई लोगों से कहा कि मेरे और मनोहर के हिस्से के खेत अलग कर दिए जायं। बड़े भैया ने समझदारी दिखाते हुए कहा कि जब तक आप जिन्दा रहेंगी समूचा खेत और यह घर आपके अधिकार में रहेगा और इसमें से हम अपने लिए कुछ भी नहीं लेंगे। मझले भैया ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि यदि आप चाहें तो हमलोग लिखित रूप में यह बातें दे सकते हैं।
       उसके बाद के छह साल में से भले आधा समय मैंने बाहर बिताया हो, पर मेरा स्थायी आश्रय इया का वही घर रहा था और समय के साथ मुझे इतना तो महसूस हो ही गया कि गांव में केवल खेती पर आश्रित परिवार अभाव में जी रहे हैं और पुरुषों की शादियां बड़ी कठिनाई से हो पा रही हैं। उस छोटे से साम्राज्य पर किसी दूसरे की मौजूदगी इया को असहज बना दिया करती थी। उसे कुछ हद तक अकेलापन प्रिय था। यह अलग बात है कि इसकी काट के लिए वह सुग्गा पाला करती थी जो उसके सिखाये हुए बोल बोला करता था। 
       वह सुग्गे का बच्चा खरीदवाकर मंगाती, उसे घर में मौजूद पिंजरे में डाल देती और उसे एक पतली सी छड़ी का डर दिखा-दिखा कर किसी स्कूल मास्टर की भांति पढ़ना यानी बोलना सिखाती। सुग्गा ज्यों-ज्यों बड़ा होता, वह मनुष्य की तरह बोलने की कोशिश करने लगता। बाहर की दालान की कड़ी में टंगे पिंजरे से निकलती सुग्गे की आवाज सुनकर सामने की सड़क पर चलते राहगीर थम जाते और वह सुग्गा और भी जोर-जोर से पंख फड़फड़ाते हुए बोलने लगता के ह ऽ के ह ऽ। तहरा का चाही? ए मनोहर मीठू के कटोरे कटोरे दूध ले आवऽ। मनोहर, मीठू के मिठाई ना देबऽ। ए इया, राम राम कहऽ, सीता राम कहऽ।........ फिर साल-दो साल बाद किसी दिन असावधानी में जब पिंजरा अपनी ठीक जगह पर नहीं टंगा रहता और  इया मकान से बाहर कहीं रहती तो कोई बिल्ली छलांग मारकर उस सुग्गे का काम तमाम कर देती। इया लौटती तो पिंजरे में सुग्गे की जगह उसके नुचे हुए एकाध पंख मिलते वह बैठकर दहाड़ मारकर रोने लगती। कुछ दिन उसी तरह बीतता और तब एक बार फिर से दूसरा सुग्गे का बच्चा आता और उसकी पढ़ाई शुरू हो जाती। 
       नौकरी में आने के बाद भी मेरा नाता उस घर से लगातार बना रहा। इया के कहने पर वह अधूरा मकान मेरे हाथों नौकरी में आने के दस वर्ष बाद पूरा हुआ। हम सब जब भी गाँव जाते तो घर में घुसते ही वह कहती कि घर में राशन-पानी नहीं है। साक्ष्य के तौर पर वह एक कमरे से एक दो हांड़ी-पतुकी निकालकर उन्हें ढनढना देती। हम मुस्कराते और बाजार जाकर महीने दो महीने का राशन खरीद लाते। हमारे दस दिन रहने के बाद उसका प्रश्न शुरू हो जाता कि कब तक छुट्टी है। जाहिर है, उसे हमारा ज्यादा दिन रहना नागवार लगने लगता। विशेषकर मेरे बच्चों की शरारतों से वह परेशान रहा करती। बड़ा बेटा पूजा का लोटा और लोटे के मुँह पर ठीक नाप से बैठी लोटकी को खिलौना मानकर उन्हें आपस में बजाते हुए तरह-तरह की धुन निकालता। छोटा वाला जहाँ भी गेहूँ या चावल देखता वहाँ पहुँचकर अपनी अँजुरी में ले लेकर छींटने लगता और लुढ़कते हुए अनाज के दानों को पकड़ने की कोशिश में कभी हँसता कभी रोता। बेटी ताखे में रखे हुए मिट्टी के पुराने दीयों  और दीयरियों को लेकर आंगन के कोने में बने तुलसी चैरे के पास चली जाती और तुलसी  के पत्तों को तोड़-तोड़कर दीयों में भरने लगती। इया इन निरर्थक हरकतों से आजिज हो उठती और चिल्ला पड़ती,
        बढ़नी बहारो रे! ई लइका हवेसन कि बवंडर। अइसन उत्पाती त लइके ना देखनी। आ ई लड़की बीया कि तुलसी जी के पतई नोचे में एतवारो मंगर नइखो देखत, आहि हो दादा  बुझाता कि तुलसी जी के उखाड़ के फेंकि दिही। का ए बछिया, का आगी में मूतले बाड़ू?
       बाद में पत्नी के माध्यम से सूचना मिलती कि हमारे पहुँचते ही खिरकी (पिछले दरवाजे) के रास्ते एक औरत के सिर पर रखकर घर का दिखाई देने लायक सारा अनाज पड़ोस के घर में पहुँचा दिया गया था और अब जब हम वापस जा रहे हैं तो वह सब फिर से इया अपने पास मंगवा लाएगी। बाद में इया के भी मुँह से निकल जाता कि फलां के घर में कुछ अनाज रखा तो उसने वापस लौटाया तो वह कम था। यह जानकर मैं इस झूठ पर नाराज होता तो पत्नी समझाती कि जब हम असुरक्षित भविष्य के प्रति चिंतित हैं तो उनका ऐसा करना अनुचित नहीं है।
       मेरी पत्नी का विनम्र स्वभाव ही था जो इया को हमसे जोड़े रखता था और वे हमारे यहाँ आया करती थीं अन्यथा मझली भाभी के दुव्र्यवहार से वे कभी भी उनके पास नहीं गई जबकि बड़े भाई साहब के यहाँ एक बार गई थी तो वापस लौटकर दुबारा न जाने की कसम ले ली थी। सामान्य अवसरों के अलावे बेटी और छोटे बेटे के जन्म के समय वह मेरे यहाँ एक माह की लंबी अवधि तक रही थी। बेटी के पैदा होने के बाद मेरी आँख में संयोग से कुछ तकलीफ हुई तो मुझे डाक्टर के पास जाना पड़ा। डाक्टर ने चश्मे का नंबर दे दिया। मेरी आँखों पर चश्मा देखते ही इया दुखी होकर बोली,
       - लइकी होखते बचवा के चसमा लाग गइल। पता ना इ बछिया आगे का करिहें। बिहारी जी से पतरा देखवले रहीं। कहते रहि गइनी कि सतइसा में परल बिया, बिधि-बेवहार करा ले। बाकी ई त देवी-देवता मानते नइखे।
       गाँव पहुँचकर उसने पूजा-पाठ कराया और बड़े बेटे के वक्त यह कहकर नहीं आई कि मेरा आना शुभ नहीं हुआ और लड़की हुई थी। बाद में जब भी आई, दस दिनों के बाद ही गाँव जाने की रट शुरू कर देती। कहती कि गाँव के मकान में लालटेन या दीया शाम को नहीं जल रहा है। वह उस घर के बारे में इस प्रकार बात करती जैसे वह घर नहीं कोई मनुष्य और उसमें भी कोई बच्चा हो। घर के साथ कभी कभी वह उस सुग्गे की बात भी करती जिसे वह अपनी अनुपस्थिति में पड़ोस के घर सौंप आई है।
       खेतों से आने वाली आमदनी और मकान अंत तक इया के जिम्मे बना रहा। इसके अलावे मैं अक्सर और बड़े भाई साहब कभी कभी कुछ न कुछ पैसे देते रहे। इया का जब भी मन होता, मकान में लोहे का एक बड़ा सा ताला लटकाकर गाँव की औरतों के दल के साथ तीर्थ-यात्रा को  निकल जाती। बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, अमरनाथ, गंगासागर, रामेश्वरम ....... शायद ही कोई तीर्थ छूटा हो। गाँव के कुछ लोग मुझसे कहते - इया के पास बहुत पैसे हैं। सूद पर चलाया है। आपलोगों को बताया है कि नहीं कि किसको कितना दिया है। नहीं बताया तो उनके बाद सब डूब जाएगा।
       उम्र ज्यादा होने के बाद वह कभी-कभी बीमार हो जाती। मुझे गांव जाना पड़ता। थोड़ा ठीक होने पर उसे ले आता अथवा पास के गांव में बड़ी बहन के यहां सहतवार पहुँचा देता। मैं उससे कहता-अब तुम मेरे पास रहो। वहां पर तुम्हें कोई कमी महसूस नहीं होगी। सभी आराम है। यहां पर तुम परेशान होती हो और हमें भी परेशान करती हो। अब तो जहां हमलोग हैं वहीं तुम्हारा घर होना चाहिए। जवाब में वह कहती-बचवा, ई घर कइसे छोड़ दीं। हमार मरद के निसानी ह। दीया-बाती ना देखाइब त उनकर अतमा ना जुड़ाई। लेकिन हमें ऐसा लगता कि चूंकि वह हमारी अपनी दादी नहीं अन्यथा हमें छोड़कर उस निर्जीव घर से उनका लगाव कैसे हो पाता।
       मेरे यहाँ इया अंतिम बार अपने मरने के दो साल पहले आई थी। उसने आते ही मुझे चेताया था,
       - गाँव के बड़कवा लोगन से दुसमनी ना करेके। ऊ जनमरवा हवेसन। सुनतानी कि ओकनी के बारे में तू एकबार में बड़ा अंट-संट लिखतारऽ। कुछ कइ दीहेंसन तऽ बेटा-बेटी अनाथ होके छछने लगिहेंसन। तनी ईहो त विचार करे के चाहीं कि जवना घरी तहार भाई लोग तहरा के ना पूछत रहे आ तू विहटी पहिन के गाँव में छिछियात चलत रहऽ त हम एकनी के माई से कहि के तहार नोकरी के सिपारिस कइले रहनी आ तू एकनी के गाड़ी में बइठि के इहाँ आइल रहऽ। आज आदमी भइल त नून के सरिअत ना भुलाए के चाहीं। (गाँव के बड़े लोगों से दुश्मनी मोल नहीं लेनी चाहिए। वे लोग कुछ भी कर सकते हैं। सुना है कि तुम अखबार में इन लोगों के विरुद्ध लिख रहे हो। तुम्हारे साथ वे लोग कुछ भी कर सकते हैं। ऐसी हालत में तुम्हारे बच्चे अनाथ हो जाएंगे। तुम्हें यह भी सोचना चाहिए कि उनलोगों की वजह से ही तुम्हें नौकरी लगी है, मेरी सिफारिश पर। तुम्हें उस नमक का हक अदा करना चाहिए।)
       मैंने उन्हें समझाया कि मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा हूँ जिससे उनका कोई आर्थिक या शारीरिक नुकसान हो। मैं कुछ भी लिखता हूँ तो उन्हें लगता है कि वह सब उनके विरुद्ध है, जबकि छपने के बाद देश के विभिन्न स्थानों से पत्र आते हैं जिनमें यह लिखा होता है कि मेरी  कहानियों के कथ्य और पात्र उनकी जगहों पर मौजूद हैं। मेरी यही गलती है कि मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता, बस।
       उन्होंने कहा कि मुझे यह सब मेरी समझ में नहीं आता। बस इतना ही कहना है कि तुम जाकर उनसे माफी माँग लो। इसके बाद सब ठीक हो जाएगा। उन्हें बस इतनी सी की अपेक्षा है। पहले के समय में आपस में कितना भी झगड़ा क्यों न हो जाय, गाँव के सवाल पर सभी लोग  एकमत हो जाया करते थे, चाहे उसमें अपने लोगों की ही गलती क्यों न हो। और जब तुम किसी के साथ नहीं रहोगे तो तुम्हारी ओर से तुम्हारे साथ कौन रहना चाहेगा।
       उस मुद्दे पर न तो मैं उन्हें समझा पाया और न तो वह मुझे अपनी बात मनवा सकी। मैं वैसे भी परेशान था। बड़े और शक्तिशाली लोगों की हाँ में हाँ नहीं मिलाना, किसी भी समय में बहुत बड़ा अपराध रहा है। मैं सदमे में था कि मेरे दोस्त और गाँव के लोग जब मुझे देखते अपना रास्ता बदल देते। कुछेक जो अपवाद थे, वे भी उजाले में मिलने से कतराते। मेरे द्वारा उपकृत लोगों में से अधिकांश मुझे नसीहत देते कि ऐसा नहीं करना चाहिए । अगले ही दिन अविनाश को बुलाकर इया भी उसके पास चली गई थी। फिर उसका गाँव से अविनाश के यहाँ आना जाना बना रहा था और विरक्त होकर मैंने गाँव जाना बिल्कुल ही स्थगित कर दिया । उस गाँव में जिसे मैं बहुत चाहता था और जिसे बेहतर बनाने का सपना देखा करता था, यहाँ आने से पहले जहाँ मैंने अपने घर में पुस्तकालय की स्थापना की थी और नवजवानों के बीच खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत की थी।

कैसे मिलोगे ओ मेरे मोक्ष!
       मेरे घर पहुँचने के तीन दिन बाद ही इया गुजर गई थी। वह सन सत्तानबे के मई का महीना था। बच्चों की प्रतियोगी परीक्षाओं का समय था। नौकरियों में सालाना पैकेज का चलन शुरू हो चुका था। वह दौर समाप्त हो गया था, जब लोग गाँव छोड़कर पूरबवाली रेल गाड़ी से कोलियरी या कलकत्ता पहुँच जाया करते थे और अपनी रोजी-रोटी के लिए कोई न कोई जुगाड़ कर लिया करते थे। नौकरी से लेकर रहन-सहन तक, सभी मामलों में लोग अब पश्चिम दिशा में पयान करने लगे हैं। बैंकों से कर्ज लेकर एक एक चीज खरीदने और बदले में ईएमआइ के इस दौर में कोई भी आदमी गाड़ी और सुविधा के तमाम जरूरी गैरजरूरी चीजों के बिना नहीं रहना चाहता। शहरों के दिन-ब-दिन सुरसा के मुख की तरह बड़े होते जाने के बावजूद सड़कें दिन-ब-दिन छोटी होती जा रही हैं।
       अपने मुट्ठी भर मित्रों और गाँव के थोड़े से लोगों के साथ जब मैं गोविंदपुर-टुंडी रोड पर बने पुल के नीचे से सरकती-बहती खुदिया नदी के किनारे इया के दाह-संस्कार की तैयारी कर रहा था, मेरी पत्नी ने किसी से कहकर मुझे आंगन में बुलवाया। आंगन में एक दो औरतों के साथ पत्नी इया के निर्जीव शरीर पर कफन ओढ़ाते हुए कुछ विधियाँ पूरा कर रही थी, जिसे घाट पर जाने से पहले हिंदू परिवार में किया जाता है। मुझे देखकर उसने पूछा,
       - इन कड़ों का क्या करूँ?
       मैंने देखा, नाटे कद की इया का शरीर सिकुड़कर आकार में और भी छोटा हो गया था और उसकी गहरे सांवले रंग की कलाइयों में सफेद किंतु मद्धिम पड़ गए चांदी के कड़े और नाक में छूंछी चमक रही थी। यह वही इया थी, जिसने मुझे किशोरावस्था के पाँच साल की अवधि के दौरान एक ऐसी मजबूत छत उपलब्ध कराई थी जिसके नीचे किसी वस्तु का अभाव होने के बावजूद उसका अभाव महसूस नहीं हुआ था और जिसके ऊपर पहुँचते हीे पास की रेल लाइन पर दौड़ती रोशनडिब्बियों सहारे सपनों के लोक में कुछ भी हासिल करना संभव था। मुझे छहफुटे गोरे-चिट्टे, हट्ठे-कट्ठे बाबा याद आए। मैं विरक्ति भरी आवाज में बोला,
       -जितने भी गहने इनके शरीर पर हैं, उन्हें इनके साथ ही जल जाना चाहिए। उनकी कोई भी चीज कुछ भी हमारे पास न हो, इसे निश्चित कर लिया जाना चाहिए।
       पत्नी आस-पास किसी और को न देखकर बोली,
       -इया जी ने एक बार मुझसे कहा था कि मेरा अंतिम संस्कार काशी में किया जाय और यदि यह संभव न हो सके तो गाँव पर सरयू के किनारे जरूर हो तो मुझे मोक्ष मिल जाएगा। फिर यहाँ इस नदी के किनारे जहाँ आग जलाकर देने वाला कोई डोम भी नहीं है, वहाँ क्या ठीक रहेगा? उनका सारा तीर्थ-व्रत बेकार चला जाएगा।
       -मैं इन ढकोसलों में विश्वास नहीं करता। मरने के बाद कहीं भी जलाया जाय, क्या फर्क पड़ता है?
       -मरने वाले को फर्क न पड़े लेकिन जो लोग जिंदा हैं उन्हें तो पड़ना चाहिए। ..... और सुना है कि यह नदी एक कुष्ट अस्पताल के पीछे से होकर गुजरती है और उसका कचड़ा उसमें गिरता है।
       -किस नदी में कचड़ा नहीं गिरता? गंगा और सरयू तो सैकड़ों कस्बों और कारखानों के कचड़े, मैला-मूत्र लेकर हमारे गाँव पहुँचती है। और काशी या गाँव ले जाकर दाह संस्कार करने में चालीस-पचास हजार से कम क्या खर्च होंगे। अभी पैसा नहीं है। बच्चों को कंपटीशन देने जाना है। एक को इलाहाबाद, दूसरे को बनारस। हैं पैसे आपके पास?
       - आपने आज तक न जाने आलतू-फालतू कितना खर्च किया होगा। इया की अंतिम इच्छा पूरी करने से हमें उनका आशीष मिलेगा। कार और घर के लिए बैंक कर्ज दे रहे हैं। क्या पता इस काम के लिए भी सरकार ने कोई योजना चला रखी हो। और नहीं तो किसी यार-दोस्त से ले - देकर ही ..........।
       - न तो कार और न किसी घर से संबंधित कोई ऐसा अनुभव मेरे पास है। अपने दादा-परदादाओं की तरह मैं नहीं बनना चाहता जो दाह-संस्कार में शाहखर्च कहलाने के लिए बीघे के बीघे खेत रेहन रख दिया करते थे या बेच देते थे।
       - गाँव के खेत से तो आप लोगों को कोई मतलब नहीं रह गया है। वे इया जी  के थे। अब वे ही नहीं हैं तो क्यों नहीं उनमें से थोड़ा सा इया जी के मद में हटा देते?
       - वे अकेले मेरे नाम से नहीं हैं। भाई लोग और उनके बच्चे हैं। उनमें से कोई बम्बई तो कोई अहमदाबाद में है। आते-आते लाश सड़ जाएगी। 
       पत्नी ने मेरी ओर याचना भरी आँखों से देखते हुए कहा,
       - अच्छा मान लीजिए, इया जी की जगह मैं होती तब भी आप क्या यही करते?
       - मैं वही करता जो मेरी मान्यता के अनुकूल हो। 
       - तब तो आप तेरह दिनों तक चलने वाला श्राद्ध कर्म भी नहीं करेंगे?
       मैंने अपनी आँखें चुराते हुए कहा-नहीं, आपलोगों के लिए इतना तो करूँगा ही लेकिन श्राद्ध कर्म में जितनी मेरी औकात रहेगी उतने में ही सब कुछ करूँगा। मेरी इन सब रूढ़ियों में कोई आस्था नहीं है।
       पत्नी ने धीरे से कहा-आप अपने विश्वास के साथ रहें लेकिन दूसरों के विश्वास पर ठेस पहुँचाना क्या उचित है? क्या इया जी के साथ इसीलिए यह सब हो रहा है  क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं है? 
       मैंने पत्नी की ओर आग्नेय नेत्रों से देखा। उसका चेहरा झुका हुआ था। दूसरी स्त्रियों की तरह इसे इन पच्चीस वर्षों में शायद पता चल चुका हो कि तमाम पति-पत्नी की भांति हमारा भी संबंध प्रेम के नहीं, विवाह के हैं, समझौते के हैं, जरूरत के हैं। यह ब्रह्मांड विचित्र है। हम जिसे प्रेम करते हैं, वह हमें शायद ही मिल पाता है और जो हमें मिलता है, हम उससे न तो प्रेम करते हैं और न संतुष्ट हो पाते और उसके साथ समागम के समय भी कहीं न कहीं किसी न किसी और में हमारा अवचेतन अटका रहता है। सबसे विचित्र तो यह है कि जिस स्त्री से हम प्रेम नहीं कर पाते, उसके गर्भ से जन्म  लेने वाले बच्चों के हँसने के समय उनके खुले मुख के भीतर कौशल्या और यशोदा की तरह हमें पूरा ब्रह्मांड नजर आने लगता है।
       पल भर के लिए लगा जैसे मैं विचलित हो जाऊँगा, लेकिन दूसरे ही क्षण मैं सजग होकर बोला-देखिए जी। यह वक्त बहस करने का नहीं है। .........वैसे मैं आज ही सबके सामने घोषणा करता हूँ कि मेरा क्रिया कर्म भी इसी खुदिया नदी के किनारे किया जाय और आर्य समाजी ढंग से केवल तीन दिन में ही सब कुछ निपटा दिया जाय। मैं तो यह भी सोच रहा हूँ कि मैं अपना शरीर दान कर दूँ।

मांगे खुद की खैर 
15 फरवरी, 2012
       इन दिनों एनसीआर के एक फ्लैट में हूँ। जनवरी के उत्तरार्ध में भयंकर रूप से बीमार पड़ गया था। बीस को अंततः अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, पर बुखार और छाती का दर्द था कि कम होने को तैयार ही नहीं था। पता लगा सीओपीडी का इन्फेक्शन है जो शुरू में ध्यान न देने की वजह से बिगड़ गया है। बड़े बेटे की कंपनी का काम इन दिनों लैटिन अमेरिका में चल रहा है। मेक्सिकों जाने का टिकट बुक हो चुका था। यात्रा स्थगित कर अपनी गर्भवती पत्नी और छोटी बच्ची को लिए दिए वह मेरे पास पहुँच गया।
       कंपनी के इस तथाकथित सुपरस्पेशियलिटी केन्द्रीय अस्पताल की हालत दयनीय थी। मंझले भाई का लड़का भी आ पहुँचा था। बेटा मुझे अपने साथ गुड़गाँव लेता गया और दामाद के स्थानीय शिष्यों के सहयोग से एक प्रसिद्ध अस्पताल में भर्ती कराया। मेरे पारिवारिक मित्र संजय ने भी सिफारिश की। छोटा बेटा पीसीएस नौकरी की प्रोबेशन अवधि होने के बावजूद बिना छुट्टी लिए अस्पताल के कैबिन में मेरी देखभाल करता रहा। कुल पंद्रह दिनों के इस सुनामी में मैंने ढेर सारे अपनों को परेशान किया। अब साइक्लोन के बाद की शांति है। दोनों बेटे अपने-अपने काम पर जा चुके हैं। बेटों और फेलोशिप के तहत कोलेरोडो में प्रवास कर रहे दामाद-बेटी के फोन आते रहते हैं और नहीं तो बड़ी बहू के माध्यम से लैपटाप पर प्रत्यक्ष बातचीत होती रहती है।
       बेटे का यह फ्लैट बड़ा है और काफी खुली जगह पर है। वह सभी कुछ मेरे लिए मौजूद है जो मुझे वहाँ  उपलब्ध था, जहाँ मैंने चालीस साल की जिंदगी बिताई है।  पास दरवाजा है जो छोटी सी बालकनी में खुलता है। दरवाजा स्वच्छ पारदर्शी शीशे का है। दाहिनी  करवट लेटने पर बालकनी के पार आकाश का एक पतला लंबा टुकड़ा दिखाई देता  रहता है। जैसे कोई एक्सप्रेसवे क्षितिज तक चला गया हो और उस आभासी सड़क को छूती, दोनों ओर ऊँची बिल्डिंगों की पंक्तियाँ खड़ी हों। उन गगनचुंबी भवनों में मल्टीप्लेक्स है, बिग बाजार है और न जाने क्या क्या हैं।
       बालकनी से बाहर दिखाई देने वाला आकाश रात में बिल्कुल नहीं दिखाई देता क्योंकि रोशनियों की चकाचैंध दीवार बनकर आंखों को रोक लेती है। आंखें मूंदने पर गाँव के मकान की छत और छत के ऊपर शामियाने के रूप में दिग्-दिगंत तक तना हुआ करोड़ों सितारों वाला आकाश दिखाई देने लगता है। बहनों के साथ ध्रुवतारे और सप्तर्षि की खोज करता मैं खुद को देख रहा होता हूँ कि गाँव के सीवान से होकर जाने वाली रेल लाइन पर से रेलगाड़ी गुजरती है। वातावरण में उसकी सीटी की आवाज गूँजने लगती है और साथ में एक गाने का मुखड़ा भी। .....कोई यूं ही मिल गया था........। कौन मिला था? कब और कहाँ मिला था। पैंतालीस कि पैंतीस कि पंद्रह साल पहले........। कि शायद कभी नहीं। 
       यहाँ मन नहीं लगता। कभी गाँव तो कभी वह जगह, जहाँ जीवनयापन के लिए चालीस साल गुजारे, याद आती है। यह तो बेटे की छह साल की बेटी है जो अपनी बांसुरी जैसी आवाज में बांध लेती है। वह डिनर के बाद मेरे पास आती है और मेरे बाएं हाथ पर अपना सिर रखकर लेटते हुए कहानी सुनने की जिद करती है। मेरी बेटी का बेटा भी जब मेरे पास होता है तो वह भी मुझसे कहानी सुनाने की जिद करता है।
       मेरे लिए यह एक अदुभुत रहस्य है कि बचपन में हर आदमी कहानियाँ क्यों सुनना चाहता है और उस वक्त की सुनी हुई कहानियाँ उसकी मृत्यु तक उसके साथ-साथ क्यों चलती रहती हैं? और कहानियाँ सुनाने वाले दादी-दादाओं के लिए यह सुख अपनी किसी  भी अन्य उपलब्धि से बड़ा क्यों लगा करता है? 
       मुझे कोई कहानी याद नहीं आती तो नाम-स्थान बदलकर अपने गाँव, मकान, बाबा, इया और पिता से जुड़ी घटनाओं को कहानी की शक्ल देकर सुना दिया करता हूँ। ऐसा करना स्मृतियों के बीच से गुजरना हुआ करता है। कोल्हुआड़े केले के पत्तों पर महिया और राब खाते माधो, गिरिधर और नागा के साथ में खुद दिखाई देता हूँ, भर्राई आवाज में यह बोलते हुए बाबा नजर आते हैं कि बबुआ मनोहर, भरोसे के लिए अब तुम्हीं बच गए हो। घूमते हुए चाक पर लिटाई गई मजदूर की निर्जीव देह और उसके पास बैठी अपनी छाती पर दोहत्थड़ मार-मारकर सरापती उसकी माँ दिखाई देती है। आदी औलादी के उस घर का उपभोग न करने का शाप क्या वाकई शाप निकला या फिर उसके किसी अलौकिक शक्ति की स्वामिनी न होने की वजह से वह उल्टा होकर वरदान में तब्दील हो गया?
       असलियत तो यह रही कि न तो हमारा परिवार उस मकान से दूर, गाँव से दूर होता और न हम बैलों-गायों और खेतों की गोबर-मिट्टी में लेथराते और श्रम करते हुए सदियों पुरानी अभावग्रस्त जिंदगी से निकलकर देश-विदेश में सुविधापूर्ण जिंदगी का उपभोग करते। 
       आजकल के बच्चे जेहनी तौर पर अपनी उम्र से ज्यादा के हो जा रहे हैं। बच्ची घटनाओं का हर मर्म तो शायद न समझती हो किंतु प्रश्न पूछ-पूछकर आजिज कर दिया करती है और अंत में नींद में प्रवेश करते-करते भाष्य के रूप में कह जाती है कि जिसने अपने दादा के भरोसे को तोड़ा और अपनी दादी की इच्छा पूरी नहीं की वह आदमी गंदा था और उसका पिता तो उससे भी गंदा था जिसने अपने पिता को तब गाली दी थी जब वह खाना खा रहा था।
       बहुत दिनों के बाद रात में नींद आती है। सुबह जब बहू चाय लेकर आती है तो मैं बोल पड़ता हूँ कि बेटा कब लौटेगा? वह आता तो मैं भी  अपने चालीस साल के ठीहे पर वापस लौट जाता। बहू कहती है,
       - उन्होंने कहा है कि आपको अब यहीं रहना है। यहाँ सब कुछ तो है। पढ़िए, लिखिए और बच्चों के साथ रहिए। वहाँ जाकर आप फिर दौड़-भाग करेंगे, लापरवाही होगी और कुछ फिर से हो जाएगा तो आपके साथ-साथ  परेशान  होना पड़ेगा। आपके बच्चों को जो जगह रोजी-रोटी देती है, वही अपनी है, आपकी है।
       उसके जाने के बाद मैं पत्नी को देखता हूँ। वह अपना हाथ मेरे ललाट पर रखकर आर्द्र नेत्रों से मेरी ओर देखती है। फिर बोलती है,   
       - आपको जब ज्यादा बुखार था तो आप बहुत कुछ बोला करते थे। कि मुझे उसी जगह ले चलो जहाँ मेरा पिछला समय पड़ा हुआ है। जहाँ रहते हुए मेरे बच्चे पढ़ लिखकर वहाँ पहुँचे हैं जहाँ की कल्पना भी मैंने नहीं की थी।
       मैं गौर से देखता हूँ तो पत्नी की आँखों में से इया झांकती दिखाई देती है। मैं सहमकर आँखें बंद कर लेता हूँ। अंदर इया की सरयू के साथ मेरी खुदिया और बहू की हिंडन एक होकर बहती नजर आ रही हैं। 
       ........ और अगर वह शाप नहीं था तो फिर मैं अश्वत्थामा बना इन तीनों नदियों की कछार में भटकने के लिए आखिर विवश क्यों हूँ।       
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‘बया‘... 2013